शहर में गर्मी के साथ पहाड़ियों पर आगजनी की घटनाएं होने लगी हैं, लेकिन इन पर काबू करने की जिम्मेदारी जिस नागरिक सुरक्षा विभाग (सिविल डिफेंस) पर है, वो खुद ही वेंटिलेटर पर है। विभाग के पास दो दमकलें हैं और दोनों ही ऑफ-रोड (कबाड़) हो चुकी हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 31 मार्च को निदेशालय ने उदयपुर में 10 फायरमैन और 1 चालक की तैनाती के आदेश तो जारी कर दिए, लेकिन सवाल यह है कि बिना दमकल के ये कर्मी करेंगे क्या? भास्कर की पड़ताल में पता चला कि विभाग की लापरवाही का बड़ा मामला भी सामने आया है। 2017 में जयपुर मुख्यालय ने दमकल उदयपुर भेजी थी। यह गाड़ी 1997 में खरीदी गई थी और इसका रजिस्ट्रेशन 2012 में ही खत्म हो चुका था। यानी एक्सपायरी डेट वाली गाड़ी उदयपुर को थमा दी गई। हद तो तब हो गई जब 2019 में इसका फिटनेस भी खत्म हो गया, फिर भी विभाग 6 माह पहले तक इसे बेखौफ सड़कों पर दौड़ाता रहा। सवाल... कबाड़ वाहन को खतरा बनाकर कैसे चलाते रहे? हादसे की स्थिति में क्लेम भी असंभव: बिना फिटनेस-रजिस्ट्रेशन के भारी वाहन को दौड़ना किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा है। हजारों लीटर पानी से भरी दमकल जब तेज रफ्तार में निकलती है और उसके ब्रेक या स्टीयरिंग फेल हो जाएं, तो तबाही मच सकती है। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत ऐसी गाड़ी का बीमा अमान्य होता है। यदि यह दमकल किसी को टक्कर मार देती, तो पीड़ित को कोई थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस क्लेम तक नहीं मिलता। जिस दमकल का फिटनेस और रजिस्ट्रेशन वर्षों पहले खत्म हो गया, उस पर आरटीओ या ट्रैफिक पुलिस की नजर नहीं पड़ी। आम आदमी के वाहन का कागज अधूरा हो तो तुरंत भारी जुर्माना ठोक दिया जाता है। सवाल यह है कि बिना रजिस्ट्रेशन और फिटनेस के एक भारी दमकल को 8 साल तक शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर कैसे दौड़ाया गया। यही नहीं, गाड़ी ऑफ-रोड करने के बाद भी इसी साल जनवरी में इसे मॉकड्रिल के लिए भेजा गया। पिछले साल पहाड़ियों में लगी आग बुझाने में भी इसी खटारा का इस्तेमाल हुआ। लेकिन, जिम्मेदार मौन है। मामले में सहायक प्रशासनिक अधिकारी (एएओ) धनेंद्र कश्यप का पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।