1. जब बिजली और नेटवर्क का बुनियादी ढांचा तैयार नहीं था, तो करोड़ों की मशीनें आनन-फानन में क्यों खरीदी गईं? 2. जो मशीनें खराब पड़ी हैं, उनके मेंटेनेंस के लिए जिम्मेदार कंपनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? 3. क्या डिजिटल इंडिया का मतलब सिर्फ महंगी मशीनें इंस्टॉल करना है, या उनका लाभ जनता तक पहुंचाना भी? जैसलमेर का भूगोल और स्पेयर पार्ट्स का रोड़ा : जैसलमेर का विस्तृत भू-भाग इस विफलता में आग में घी का काम कर रहा है। दूरदराज के गांवों में अगर कोई मशीन खराब होती है, तो उसे ठीक करने का खर्च मशीन की उपयोगिता से ज्यादा आता है। पार्ट्स उपलब्ध नहीं हैं, और जयपुर या जोधपुर से मैकेनिक बुलाने में महीनों बीत जाते हैं। जैसलमेर में ई-शासन के नाम पर जो सेटअप खड़ा किया गया था, वह तकनीकी खामियों के मकड़जाल में फंसा है। जिले में कुल 219 मशीनें आवंटित हुई थीं, जिनमें से 8 मशीनें फलोदी जिले में चली गईं। सिर्फ 120 मशीनें कागजों में चालू बताई जा रही हैं, लेकिन धरातल पर इनका उपयोग शून्य के बराबर है। 60 मशीनों में नेटवर्क गायब, इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने से ये मशीनें बेकार हो चुकी हैं। 10 मशीनों तक बिजली नहीं, डिजिटल इंडिया का सपना उन जगहों पर देखा गया, जहां अब तक बिजली का प्लग तक नहीं पहुंचा। 20 मशीनों के पार्ट्स गायब हो गए। ^जैसलमेर में नेटवर्क की समस्या है। ब्लॉकों की संख्या बढ़ने से कनेक्टिविटी में दिक्कत आई है, जिसे दूसरे फेज में दूर कर लिया जाएगा। - जयश्री, उपनिदेशक, सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग इन मशीनों को इसलिए लगाया गया था ताकि ग्रामीण बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के खुद अपना काम कर सकें। लेकिन धरातल पर न तो मशीनों को चलाने के लिए बिजली है और न ही सर्वर से जोड़ने के लिए नेटवर्क। सबसे बड़ी विफलता प्रचार-प्रसार की कमी रही। न कोई गाइड है, न ही निर्देश बोर्ड। भास्कर न्यूज| जैसलमेर जैसलमेर में सरकार की महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया योजना अधिकारियों की लापरवाही और सिस्टम की उदासीनता की भेंट चढ़ गई है। आमजन को दफ्तरों के चक्करों से मुक्ति दिलाने और एक ही छत के नीचे जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। करीब 5 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत से खरीदी गई 211 ई-मित्र प्लस मशीनें आज सरकारी दफ्तरों और ग्राम पंचायतों के कोनों में 'शो-पीस' बनकर रह गई हैं। हालात इतने बदतर हैं कि करोड़ों का निवेश अब कबाड़ में तब्दील हो रहा है।