भास्कर न्यूज | भीलवाड़ा सनातन धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में प्रवेश मत करना। सनातन धर्म के लिए भारत भूमि के शेरों ने अपने शीश कटा दिए, पर धर्म नहीं छोड़ा। जंगल में पड़े रहे, घास की रोटी खाई और मरते मर गए, लेकिन धर्म नहीं छोड़ा। आज के जमाने में लोगों को सनातन धर्म अच्छा नहीं लग रहा और वे इसे छोड़कर दूसरे धर्म से जुड़ रहे हैं। शिवमहापुराण की कथा एक बड़ी सुंदर बात कहती है कि सूखी रोटी खा लेना, चटनी से रोटी खा लेना, दुनिया के धक्के खा लेना, पर दूसरे धर्म में कभी प्रवेश मत करना, अपना सनातन धर्म मत छोड़ना। सनातन धर्म को छोड़ने वाला दुनिया के धक्के खाकर महादेव की शरणागति पाता है, तभी उसका जीवन सफल होता है। हर तरफ से दुखी हो गए हैं तो आखिर में महादेव को एक लोटा जल चढ़ाना तुम्हारी सारी राहें खुल जाएगी। यह बात आजादनगर स्थित मेडिसिटी ग्राउंड में संकटमोचन हनुमान मंदिर के महंत बाबूगिरी महाराज के सानिध्य में हो रही श्री शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन गुरुवार को सिहोर के पंडित प्रदीप मिश्रा ने कही। कथा समाप्ति पर जयपुर स्थित हवामहल विधानसभा के विधायक बाल मुकंदाचार्य ने भी श्रोताओं को संबोधित करते हुए सनातन धर्म महिमा बताई। कथा के दौरान पंडित मिश्रा ने कहा कि मंथरा सभी के पास जाएगी। वो मंथरा तुम्हारे पास भी आएगी। अब वह यह देखती है कि किसके मां-बाप के संस्कार कैसे हैं। मंथरा जानती थी कि माता-पिता के संस्कार ऐसे संस्कार होते हैं जो जीवन में हमेशा अपने भीतर रहते हैं। इसलिए मंथरा आएगी, तुम्हारे को भड़काने का प्रयास करेगी। यह मंथरा धीरे-धीरे 'स्लो पॉइजन' तुम्हारे कानों में देना प्रारंभ करेगी और याद रखना, तुमने अगर मंथरा की बात सुन ली तो तुम्हारा घर टूट गया। फिर वो घर संभल नहीं पाएगा। घर दूसरों के सुनने से बिगड़ा है, तो शिवमहापुराण सुनने से सुधरना प्रारंभ होगा। भीलवाड़ा मेडिसिटी ग्राउंड शिव महापुराण कथा करते पंडित प्रदीप मिश्रा व पंडाल में बैठे श्रद्धालु। पंडित मिश्रा बताते हैं कि पूरी जिंदगी आप जल चढ़ाते रहो और आपका विश्वास ही शिव के प्रति नहीं है, तो उस जल का कोई महत्व नहीं है। मूल है आपका भरोसा और विश्वास। शिव महापुराण कथा कहती है कि जब भगवान शिव के पास एक जीव भी जाए और यदि वह भरोसे से जा रहा है और यह निश्चित करके जा रहा है कि शिव मेरी बातों को सुनेंगे, शिव सुनते हैं और यदि संसार का कितना भी विद्वान से विद्वान व्यक्ति क्यों न हो, उसकी कितनी भी विद्वत्ता क्यों न हो, और वो बिना विश्वास के अगर जिंदगी भर भी तप करे, भजन करे, स्मरण करे तो भी उसका कोई फल नहीं है। "दो पांव का रहता है, कहीं पर भी आता-जाता है। मानव का जीवन जीता है, खाता है, पीता है, रहता है। शादी हो गई, उसके साथ में दो पांव और जुड़ गए। अभी तक वह मानव था, अब चार पांव वाला हो गया, मतलब वह पशु हो गया। जिसके साथ वह फेरे ले रहा है, दो पांव उसके हैं और दो पांव पीछे-पीछे जो चल रही है उसके हैं। अब वह चार पांव का हो गया, पशु हो गया। पशु का मतलब है, अब उसके ऊपर भार आ गया। गधे जैसा अब उसको बोझ ढोना ही ढोना है। पूरे परिवार को लेकर चलना है। लोग कहते हैं शंकर भगवान 'पशुपतिनाथ' हैं। शिव महापुराण में भगवान शंकर के विवाह का प्रसंग कह रहा है कि भगवान शंकर पार्वतीजी से कहते हैं कि 'केवल मैं अकेला पशुपतिनाथ नहीं हूं, जिस लड़के की शादी होती है और वह अपनी पत्नी के साथ जब सात फेरे लेता है, तो वह भी पशुपतिनाथ बन जाता है।