भास्कर न्यूज | रेलमगरा श्रमणसंघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषि ने भीलवाड़ा स्थित अरिहंत भवन जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में कहा कि मैंने किया का भाव ही अहंकार का मूल है, जो व्यक्ति की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बनता है। आत्मविकास का मार्ग आत्मनिरीक्षण, विनम्रता और निरंतर सीखने से प्रशस्त होता है। अभिगम विषय का आगमिक विवेचन करते हुए उन्होंने कहा कि अभिगम का वास्तविक अर्थ केवल परमात्मा के सम्मुख पहुंचना नहीं, बल्कि उनके सामने खड़े होने की पात्रता अर्जित करना है। धर्म का आरंभ चरणों से नहीं, बल्कि चरित्र से होता है। अभि का अर्थ सम्मुख और गम का अर्थ जाना है, किंतु धर्म में अभिगम निर्मल भावों के साथ परमात्मा के सामने मौजूद होने की साधना है। इस दौरान उन्होंने बच्चों के संस्कारों, धर्म, नैतिकता, करुणा और जीवन-मूल्यों पर विशेष बल दिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में सम्मान के लिए व्यक्ति उपहार लेकर जाता है, लेकिन परमात्मा के द्वार पर धन, वैभव या प्रदर्शन का कोई महत्व नहीं है। वहां श्रद्धा, विनय, संयम और निर्मल अंतःकरण ही सर्वोत्तम अर्पण हैं। अभिगम का पहला सोपान सचित्त त्याग है, जिससे व्यक्ति अपने आत्मस्वरूप का बोध करता है और प्रत्येक जीव में चेतना का अनुभव करते हुए अहिंसा, करुणा और समदृष्टि का विकास करता है। धर्म की शुरुआत बाहरी परिवर्तन से नहीं, बल्कि दृष्टि और चेतना के परिष्कार से होती है। यदि धार्मिक जीवन भी दिखावे और प्रचार का माध्यम बन जाए तो साधना का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। संतों के दर्शन का उद्देश्य केवल सामाजिक पहचान बनाना नहीं, बल्कि उनके जीवन-मूल्यों को आत्मसात करना है। भारतीय संस्कृति में हाथ जोड़कर किया जाने वाला नमस्कार अहंकार के समर्पण और विनय की अभिव्यक्ति है। बच्चों के संस्कारों पर विशेष जोर देते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ धर्म, नैतिकता, करुणा और जीवन-मूल्यों का संतुलित संस्कार होना आवश्यक है। बच्चों के मन में किसी संप्रदाय या संत के प्रति पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि सद्भाव, विवेक और विनय का विकास किया जाना चाहिए। विनय, कृतज्ञता, आत्मनिरीक्षण और अहंकार का त्याग ही साधना की वास्तविक उपलब्धि है। चातुर्मास के तहत 19 जुलाई को शोभायात्रा निकाली जाएगी, जिसके साथ शांतिभवन में युवाचार्य और साध्वीवृंद का चातुर्मास मंगल प्रवेश संपन्न होगा।