राजस्थान क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा 16 जुलाई 1979 की रात एक ही परिवार के 8 सदस्यों की हत्या कर दी गई। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में स्थित बिरकाली गांव में सोते समय परिवार पर हमला किया गया था। किसान भगतु राम, उसकी पत्नी, एक बेटे और पांच छोटी-छोटी बेटियों को कुल्हाड़ियों और तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया था। जांच में पुलिस के हाथ कोई भी ऐसा सुराग नहीं लग पा रहा था, जो हत्याकांड की वजह और हत्यारों को पकड़ने में मददगार बन सकता हो। पुलिस ने पहले लूट या चोरी के एंगल से भी पड़ताल करने की कोशिश की, लेकिन घर से कुछ भी गायब नहीं हुआ था। ऐसे में पुलिस को हत्याकांड का सच सामने लाने के लिए अभी इन सवालों के जवाब तलाशने बाकी थे… अब पढ़िए आगे… पुलिस हैरान थी कि इतनी बड़ी वारदात और सगे छोटे भाई भगतु राम सहित और उसके पूरे परिवार के हत्या के बाद भी उसका बड़ा भाई बिरकाली गांव नहीं पहुंचा था। ऐसे में पुलिस ने दोनों भाइयों के बीच के रिश्ते को लेकर पड़ताल शुरू की। इस बीच पुलिस को पता चला कि दोनों भाइयों के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। हरियाणा से राजस्थान में आकर बस गए थे भगतु राम और श्योलाल दोनों भाई हरियाणा के सिगोरानी गांव के रहने वाले थे। घटना से लगभग 20 साल पहले, दोनों भाई यहां बिरकाली गांव (राजस्थान) में रहने आए और उन्होंने खेती के लिए 50 बीघा कृषि भूमि खरीदी। इसके बाद दो-तीन साल तक दोनों भाई बिरकाली में संयुक्त रूप से रहे और उसके बाद श्योलाल अपने पैतृक गांव सिगोरानी लौट गया था। इससे पहले, श्योलाल ने इस संपत्ति में से अपना हिस्सा 1,200 रुपए में बिरकाली गांव में किसी के पास में गिरवी रख दिया था। भाई ने संपत्ति में हिस्सा मांगा था इधर श्योलाल के गांव छोड़ने के बाद भगतु राम ने भाई श्योलाल की वह गिरवी जमीन छुड़ा ली। इसका पता जब श्योलाल को लगा तो वो वापस बिरकाली गांव आया था। श्योलाल ने उस संपत्ति में अपना हिस्सा भाई भगतु राम से वापस मांगा। भगतु राम ने इसके लिए उसके सामने एक शर्त रख दी कि श्योलाल उसे 1,200 रुपए कर्जे वाली राशि का भुगतान करेगा तो ही वो उसे उसका जमीन का हिस्सा देगा। श्योलाल को ये मंजूर नहीं था। ऐसे में दोनों के बीच के रिश्ते खराब हो गए। विवाद सुलझाने के प्रयास भी हुए थे हत्याकांड वाली घटना से दो-तीन महीने पहले ही, भगतु राम और श्योलाल ने मामले को सुलझाने के लिए बिरकाली गांव के प्रभावशाली लोगों से संपर्क किया था। नोहर पंचायत समिति के पूर्व प्रधान नानूसिंह और गांव के एक अन्य व्यक्ति ने दोनों के बीच विवाद सुलझाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए थे। हिस्सा नहीं मिलने के बाद बढ़ी दुश्मनी श्योलाल, भगतुराम को 1,200 रुपए देने को तैयार नहीं था। वहीं भगतुराम भी बिना रुपए लिए उसे जमीन का हिस्सा देने की बात नहीं मान रहा था। श्योलाल ने नानूसिंह और अन्य लोगों से तब कहा था कि अब उसे किसी भी पंचायती की जरूरत नहीं है और वह बिना किसी के हस्तक्षेप के खुद ही अपने परिवार के इस विवाद को सुलझा लेगा। इसके बाद श्योलाल अपने भाई भगतुराम से दुर्भावना और दुश्मनी रखने लगा था। पड़ोसियों ने रात की पूरी कहानी बताई अब तक हत्याकांड का मंजर देखने वाले भगतु राम के तीनों पड़ोसियों ख्यालीराम, राम किशन और जयसिंह में हिम्मत आ गई थी। वो पुलिस के सामने गवाही देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने पुलिस को बताया कि भगतु राम और उसके परिवार को निर्दयता से खत्म करने वाला कोई और नहीं बल्कि उसका ही सगा बड़ा भाई श्योलाल, उसके साथी रणजीत सिंह और बनवारी हैं। स्पेशल टीम बनाकर आरोपियों की धर-पकड़ शुरू हुई पुलिस के पास अब हत्यारों के नाम, मकसद और तीन चश्मदीद गवाह थे। पुलिस ने तत्काल सभी आरोपियों को पकड़ने के लिए स्पेशल टीम बनाई और धर-पकड़ शुरू कर दी। पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया। साथ ही, एक नाबालिग भी पकड़ा गया। आरोपियों से पुलिस पूछताछ में सामने आया कि 15 जुलाई 1979 (रविवार) को ही श्योलाल ने अपने भाई भगतु राम और उसके परिवार के खात्मे का प्लान फाइनल कर लिया था। इसके लिए उसने रणजीत सिंह और बनवारी को तैयार किया था। हथियार इकट्ठे किए और 16 जुलाई की रात भगतु राम के घर में घुसकर हत्याकांड को अंजाम दे दिया। पूछताछ पूरी होने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को जेल भेज दिया। 18 गवाह पेश हुए थे ट्रायल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। सरकारी वकील ने कुल 18 गवाह पेश किए। सबसे महत्वपूर्ण गवाह बना एक आरोपी बनवारी। बनवारी सरकारी गवाह बन गया था। उसने आरोपी श्योलाल और रणजीत सिंह के खिलाफ गवाही दी और उनकी प्लानिंग और मर्डर एग्जीक्यूशन के पूरे सच को कोर्ट में बयान कर दिया था। इसके अलावा पड़ोसियों की गवाही ने भी मामले को मजबूत किया। गांव के एक बढ़ई हनुमान ने भी सूर्यास्त के समय श्योलाल और उसके साथियों को जलकुंड (तालाब) के पास देखा था, जहां से वे भगतुराम के घर की तरफ गए थे। पुलिस ने हथियार बरामद किए पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर हथियार भी बरामद कर लिए थे। ट्रायल कोर्ट ने तब जजमेंट में टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह प्री प्लांड, क्रूर और शैतानी अपराध है। सोते हुए मासूम बच्चों पर हमला। पूरे परिवार का सफाया। इस मामले में मृत्युदंड ही उचित है। एक आरोपी नाबालिग था। इसलिए उसका केस बाल न्यायालय भेजा गया था। दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली फैसले के खिलाफ आरोपी पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट में 25 जनवरी 1988 को जस्टिस जगन्नाथ शेट्टी, बी.सी. रे और जी.एल. ओझा की बेंच ने मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा कि सोते हुए मासूम बच्चों को घातक हथियारों से मौत दी गई। क्रूरता से पूरे परिवार को मौत के घात उतार दिया गया। ऐसे में आरोपियों को मृत्युदंड दिया जाना ही उचित है। जयपुर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई इसके बाद 28 नवंबर 1991 को जयपुर सेंट्रल जेल में 76 साल के श्योलाल और 32 साल के रणजीत सिंह को एक साथ फांसी दे दी गई। ये पहली बार था जब राजस्थान में किसी एक ही केस में दो दोषियों को एक साथ फांसी दी गई थी। कुल्हाड़ी-तलवारों से काटकर पति-पत्नी और 6 बच्चों की हत्या:फर्श-दीवारें खून से लाल हो गई; पड़ोसी भी घर में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पाए