नौखला गांव, बांसवाड़ा (राजस्थान), 6 मई 1993…रात का घना अंधेरा था। आदिवासी गांव नौखला में सन्नाटा छाया हुआ था। हवा में सिर्फ दूर कहीं कुत्तों की भौंकने की आवाज सुनाई दे रही थी। गांव के लगभग सभी लोग अपने घरों में सो चुके थे। अचानक एक घर से चीखें फूट पड़ीं। आसपास घरों में सो रहे लोग सहमकर जाग गए। चीखें गांव के ही आदिवासी युवक रावजी उर्फ रामचंद्र के घर से आ रही थी। रावजी उर्फ रामचंद्र नौखला गांव का एक साधारण आदिवासी युवक। वो स्कूल टीचर बनने की तैयारी कर रहा था। लोग उसे शांत, मिलनसार, परिवार से बेहद लगाव रखने वाला और मेहनतकश बताते थे। रावजी के घर में उसकी पत्नी सुखी, बड़ा बेटा गुड्डू (7 साल), छोटा बेटा भैया (5 साल), छोटी बेटी गुड्डी (3 साल) और बुजुर्ग मां मंगली बड़ी हंसी खुशी रहते थे। इसी बीच रावजी के पड़ोसी गुलाब परमार के घर से भी चीखें सुनाई देने लगीं। ये चीखें गुलाब परमार के बेटे की बहु गलाल परमार की थी। गुलाब परमार बहु गलाल को बचाने दौड़े। इस बीच रास्ते में रावजी हाथ में कुल्हाड़ी लिए खड़ा था और उसका पूरा शरीर खून से सना हुआ था। गुलाब उससे कोई बात करते कि इससे पहले ही उसने गुलाब परमार पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर दिए और उसकी हत्या कर दी। इसके बाद वो शख्स वहां से भाग गया। अभी भी वहां गुलाब परमार के बेटे की बहु गलाल और रावजी की मां मंगली की चीखें सुनाई दे रही थी। गांव के दूसरे लोग घरों से बाहर निकले। सबसे पहले कुछ लोग रावजी के घर पहुंचे। वहां रावजी की पत्नी सुखी, तीनों बच्चों की जगह-जगह से कटी हुई लाशें बिखरी पड़ी थी। वहीं मां मंगली बुरी तरह से घायल होकर बेहोश हालत में पड़ी थी। इधर कुछ लोग गुलाब परमार के घर की तरफ भागे। रास्ते में ही गुलाब परमार का भी शव पड़ा था। उसे भी कुल्हाड़ी के वार कर जगह-जगह से काटा गया था। लोग गुलाब के घर में पहुंचे तो गुलाब के बेटे की बहू भी बुरी तरह से घायल हालत में कराह रही थी। वो कुछ भी बताने की कंडीशन में नहीं थी। ऐसे में लोगों ने तत्काल गढ़ी पुलिस स्टेशन के तत्कालीन पुलिस ऑफिसर सुल्तान बख्स को घटना की इत्तिला दी और घायल मंगली और गलाल को बांसवाड़ा हॉस्पिटल भिजवाया। जहां से उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया गया। घटना की जानकारी मिलते ही तत्कालीन पुलिस ऑफिसर सुल्तान बख्स मय पुलिस जाब्ते के घटनास्थल पर पहुंचे। सभी 5 शव पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भिजवाए। उन्होंने बड़े अधिकारियों को भी इस भीषण हत्याकांड की जानकारी दे दी। अगली सुबह 7 मई 1993 को भीमा पिता देवजी राणा ने नौखला थाने में मुकदमा दर्ज करवाया। हत्याकांड में पुलिस को अब सच जानने के लिए रावजी उर्फ रामचंद्र की तलाश थी। पुलिस ने थोड़ी मशकक्त के बाद रावजी को गांव के बाहर से पकड़ लिया। रावजी ने पुलिस के हाथ लगते ही चिल्लाते हुए कहा कि इन सभी को मैंने मारा है। पूछताछ शुरू हुई। लेकिन रावजी कुछ खास नहीं बोल रहा था। कोई मोटिव सामने नहीं आ रहा था। कोई पुरानी दुश्मनी, कोई झगड़ा, कोई आर्थिक संकट कुछ भी नहीं। एकमात्र बयान जिसमें हत्यारा खुद हत्या करना कबूल रहा था। हालांकि अभी भी पुलिस इन्वेस्टिगेशन अधूरी थी, पुलिस को कई सवालों के जवाब तलाशना बाकी था कल पार्ट-2 में पढ़िए इन सभी सवालों के जवाब…