नमस्कार, पूर्व विधायक ने घूंघट निकालकर नगर पालिका के EO को ढंग से झाड़ दिया। पूर्व सरपंच चोरी करते रंगे हाथों धरा गया और विधायक की बिना गाय वाली गोशाला पर बुलडोजर चल गया। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. घूंघट में पूर्व MLA ने लगा दी 'क्लास' कान्स फिल्म फेस्टिवल में एक मॉडल घूंघट में रेड कार्पेट पर उतरी थी। उसने घूंघट निकालकर घूंघट का विरोध किया था। कुप्रथा बताया था। गीतकार इंदीवर साहब ने एक खूबसूरत गाना लिखा था- दिल को देखो, चेहरा न देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा और चेहरा झूठा। कुछ लोगों का चेहरा बिना घूंघट भी ढका होता है। कुछ चेहरे पर चेहरा लगाकर घूमते हैं। एक चोर ने तो प्रधानमंत्रीजी का चेहरा लगाकर वारदात कर दी। घूंघट, नकाब या हिजाब मान्यताओं के नाम हैं, परंपराओं के नाम हैं, रिवाज के नाम हैं। संविधान ने अपनी परंपराओं को निभाने की आजादी दी है। घूंघट का विरोध करने कान्स पहुंचीं मोहतरमा को पश्चिमी देशों की 'ब्राइडल वेल' परंपरा का विरोध भी करना चाहिए था। इसमें दुल्हन सफेद जालीदार घूंघट पहनती है। ताकि उसे किसी की बुरी नजर न लगे। खैर, बात है उदयपुर के वल्लभनगर से विधायक रहीं प्रीति गजेंद्र शक्तावत की। बड़े राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने और खुद विधायक रह लेने के बावजूद उन्होंने परंपरा का साथ नहीं छोड़ा है। घूंघट उनकी नजर में अदब का हिस्सा है। उन्हें पता चला कि भिंडर नगर पालिका का EO जनता के काम अटका रहा है। तो वे उसके दफ्तर पहुंचीं और फर्राटेदार अंग्रेजी में लताड़ पिला दी। अधिकारी सकपका गया। अधिकारी को फटकारते वक्त भी पूर्व विधायक घूंघट में थीं। स्वागत हो या फिर विरोध प्रदर्शन, उनका घूंघट कायम रहता है। EO साहब अब बता सकते हैं- क्या घूंघट कमजोरी की निशानी है? 2. कब होंगे पंचायत चुनाव.. कानून मंत्रीजी ने कहा है कि सरकार तो पंचायत चुनाव कराने की मंशा रखती है। सारा काम भी मुकम्मल कर दिया है। अब चुनाव आयोग को फैसला करना है। चुनाव की गेंद इस पाले से उस पाले में उछल रही है। इधर निवर्तमान और पूर्व हो चुके नेताओं के धैर्य की परीक्षा हो रही है। कुछ का जवाब दे गया है। बूंदी के नैनवां में बामनगांव के पूर्व सरपंच साहब टोंक जिले के रायपुरिया गांव में बाइक चुराते रंगे हाथों धरे गए। गांव के लोगों ने पहले तो उन्हें पिलर से बांधकर पीटा। फिर कपड़े उतार कर कैंची से बाल काट डाले। पंचायती के चुनाव वक्त पर हुए होते तो हो सकता है कि वे चुनाव लड़ते। संभव है जीत भी जाते। फिर उन्हें दूर गांव जाकर बाइक चुराने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि राजनीति में दम-खम दिखाने की ललक रखने वाले दूसरे क्षेत्रों में जोर-आजमाइश करें, चुनाव हो ही जाने चाहिए। 3. चलते-चलते.. राजनीति में रहते हुए अगर आपने जमीन-जायदाद नहीं बनाई तो खाक राजनीति में रहे। लेकिन हब्बड़-तब्बड़ नहीं होनी चाहिए। भीलवाड़ा के शाहपुरा से विधायक लालारामजी ने कई पीढ़ियों का जुगाड़ सोचा था। इसके लिए उन्हें सबसे मुफीद लगी गाय। गाय की पूंछ पकड़कर वे भव सागर से पार उतरना चाहते थे। इसलिए गो रक्षा आंदोलन चलाया। गाय की रक्षा को देश की रक्षा से जोड़ा। इसके बाद हाईवे किनारे बढ़िया 20 बीघा सरकारी जमीन देखी। गोचर जमीन को वे गोशाला के रूप में देखने लगे। गोशाला के लिए एक संस्था बना ली। संस्था में खुद सचिव बन गए। बड़े बेटे को अध्यक्ष बना दिया। छोटा बेटा कोषाध्यक्ष बन गया। और तमाम रिश्तेदार कुछ न कुछ बन गए। संस्था के जरिए सहकारिता विभाग से उसी जगह गोशाला की जमीन का आवंटन करा लिया। इसके बाद रातों रात तारबंदी कराई, बिजली कनेक्शन ले लिया, टिनशेड का ढांचा खड़ा कर दिया। फाइल कलेक्टर की टेबल पर पहुंची तो आवंटन में कई खामियां मिली। गोशाला में गाय तो एक भी नहीं थी। तीन साल का गोशाला का अनुभव नहीं था। मामला रद्द हो गया। इस बीच पत्रकारों ने पोल खोल दी। जो जमीन आवंटित ही नहीं हुई उस पर बिजली कनेक्शन कैसे मिल गया? आनन-फानन में प्रशासन ने बिजली काटी और फिर ढांचे पर बुलडोजर चला दिया। माननीय ने फेसबुक पर एक पर्चा पोस्ट किया जिसमें लिखा था कि संस्था के सचिव पद से त्यागपत्र देता हूं। सफाई में विधायकजी बोले-संस्था से मेरा लेना-देना नहीं। मैंने तो इस्तीफा दे दिया था। तो माननीय किससे पूछें? बेटा अध्यक्ष है। उसने इस्तीफा मंजूर किया या नहीं? इनपुट सहयोग- मनीष जैन (भीलवाड़ा), मुकेश हिंगड़ (उदयपुर), मुकेश नागर (बूंदी)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।