बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद राजकुमार रोत ने स्विट्जरलैंड में अनुसूचित जनजातियों को भारत का मूल निवासी (इंडिजिनस पीपुल्स) स्वीकार करने की मांग उठाई। उन्होंने भारत सरकार के उस रुख से असहमति जताई, जिसमें कहा जाता है कि भारत में कोई अलग इंडिजिनस समुदाय नहीं है। जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आदिवासी अधिकारों पर विशेषज्ञ तंत्र (ईएमआरआईपी) के 19वें सत्र में भारत के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने अपनी बात कही। भारत की 705 अनुसूचित जनजातियों का किया उल्लेख अपने संबोधन में सांसद रोत ने कहा कि भारत में प्रोटो-ऑस्ट्रालॉइड, नीग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड जैसे विभिन्न आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। भारतीय संविधान ने इन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी है। देश में 705 अनुसूचित जनजातियां हैं, जिनकी आबादी लगभग 14 करोड़ है। उन्होंने कहा कि इन्हीं अनुसूचित जनजातियों को भारत के इंडिजिनस पीपुल्स के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी दिया हवाला रोत ने अपने संबोधन में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की कैलाश बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) मामले में की गई टिप्पणी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस टिप्पणी में अनुसूचित जनजातियों को भारत के मूल निवासियों का वंशज बताया गया था। 'करोड़ों आदिवासियों की आवाज पहुंचाई' सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर भील आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करना उनके लिए गर्व और सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि यह केवल उनका व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि देश के करोड़ों आदिवासी भाई-बहनों की आवाज है, जिसे उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी मजबूती से रखा।