राजस्थान हाईकोर्ट ने ऑनर किलिंग मामले में बेटी और उसके प्रेमी की हत्या के मुख्य आरोपी पिता और अन्य परिजनों को बरी कर दिया। नवंबर 2024 में सीकर की एडीजे कोर्ट ने ऑनर किलिंग का दोषी मानते हुए पिता को फांसी और अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सभी पर आलोदा गांव निवासी, प्रेम और गणपतलाल की हत्या का आरोप था। आरोप प्रमाणित न कर पाने के आधार पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की बेंच ने शुक्रवार को फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने पिता रामगोपाल उर्फ गोपाल, चाचा महादेव, मामा परसराम चोपड़ा, चचेरे भाई महेंद्र चौधरी उर्फ महेंद्र मील, नंदलाल, बीरबल, सोहनलाल, मदनलाल, संदीप गुर्जर और बाबूलाल उर्फ हरनेक को बरी किया है। प्रदेश में जांच अधिकारियों को ट्रेनिंग देने के निर्देश इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस जांच में हुई गंभीर लापरवाही और सबूत एकत्र करने में त्रुटियों को उजागर किया है। कोर्ट ने डीजीपी को राजस्थान के सभी जांच अधिकारियों, थाना प्रभारियों और पर्यवेक्षक अधिकारियों के लिए इन पहलुओं पर ट्रेनिंग के आदेश दिए।
कोर्ट ने कहा- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-2023 के अनुरूप डीजीपी सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स लेकर उन्हें साबित करने के लिए दो महीने में एसओपी तैयार करके उसे लागू करवाएं।
बिना फोरेंसिक जांच के इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश कर दिए हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस जांच के हर स्तर पर पाई गई भारी चूक और कमियों को उजागर किया है। कोर्ट ने पाया कि मामले का मुख्य आधार सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर थे, जिन्हें पुलिस ने लापरवाही से रखा। रामगोपाल के घर और पेट्रोल पंप से जब्त किए डीवीआर और पेन ड्राइव बिना सील किए जब्त किए गए। वहीं उन्हें मालखाने में भी सही तरीके से जमा नहीं कराया गया। मालखाने के रजिस्टरों में एंट्री का भी अभाव रहा। यह तक रिकॉर्ड में नहीं था कि डीवीआर कब बाहर निकाला गया और किसने इसका इस्तेमाल किया। अभियोजन पक्ष साक्ष्यों की 'चेन ऑफ कस्टडी' को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। पेन ड्राइव और डीवीआर को बिना किसी फॉरेंसिक जांच के सीधे कोर्ट में पेश कर दिया गया। शुरुआती रिपोर्ट-शिकायत को दबाया कोर्ट ने कहा- घटना की जानकारी मिलने के बावजूद पुलिस ने समय पर एफआईआर दर्ज नहीं की। खाटूश्यामजी थाने में दी गई शुरुआती रिपोर्ट और शिकायत को दबा दिया गया। कानून के अनुसार- यदि वास्तविक शुरुआती शिकायत को छिपाया जाता है तो पूरी जांच और एफआईआर संदिग्ध और 'पोस्ट-इन्वेस्टिगेशन डॉक्यूमेंट' बन जाती है। मृतकों के शवों की बरामदगी, हथियारों (केबल के टुकड़े) की जब्ती और खुलासे के बयानों में पुलिस अधिकारियों ने कानून के मुताबिक आरोपियों के सटीक शब्द अदालत में दर्ज नहीं कराए। यह साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत अनिवार्य हैं। अदालत ने ‘कट्यायन स्मृति’ के श्लोक का किया जिक्र हाईकोर्ट ने अपने आदेश में करीब 2 हजार साल पुराने ‘कट्यायन स्मृति’ के श्लोकों से साक्ष्य और न्याय के महत्व को समझाया। कोर्ट ने कहा- साक्ष्य को धर्म की आंख कहा गया है और यही न्याय प्राप्त करने का मुख्य साधन है। यदि किसी मामले में साक्ष्य न हो, तो सही निर्णय संभव नहीं होता। सत्य का स्वभाव यह है कि उसका कभी नाश नहीं होता। विद्वान न्यायाधीश को बिना साक्ष्य के किसी बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए। कथन मात्र को प्रमाण नहीं माना जा सकता। जहां लिखित प्रमाण, साक्ष्य और तर्क-तीनों का समन्वय होता है। वहीं सत्य स्पष्ट होता है और न्याय निश्चित रूप से स्थापित होता है। 2019 में प्रेम प्रसंग के चलते हत्या का था मामला मामला 20 अक्टूबर 2019 का है। रात को बेटी (प्रेम) अपने प्रेमी (गणपतलाल) से बात कर रही थी। पिता रामगोपाल को भनक लग गई थी उसने 21 अक्टूबर की रात को प्रेम की बुरी तरह पिटाई की थी। इसके बाद उससे गणपत को बुलाने को कहा। गणपतलाल पेट्रोल पंप के पास पहुंचा तो रामगोपाल के कहने पर अन्य परिजनों ने उसका किडनैप कर लिया था। इसके बाद घर ले जा कर दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट की थी।
मारपीट के दौरान दोनों की मौत हो गई। शवों को रामगोपाल ने गाड़ी में डालकर जीणमाता-मांडोली की पहाड़ियों में फेंक दिया था। इसके बाद रामगोपाल ने खाटूश्यामजी थाने में बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। संदेह जताया कि कुछ अज्ञात लोग उसकी बेटी का किडनैप कर ले गए थे।
23 अक्टूबर को युवक गणपत के भाई बलदेव ने उसके अपहरण की रिपोर्ट रानौली थाने में दर्ज करवाई थी। इसके बाद हत्या के मामले का खुलासा हुआ था। अभियोजन पक्ष की ओर से 69 गवाह और 270 आर्टिकल पेश किए गए। घटनास्थल के सीसीटीवी कोर्ट की ओर से ट्रायल के दौरान देखे गए, जिनमें दोनों के साथ आरोपी मारपीट करते हुए नजर आ रहे थे।
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