राजस्थान की पारंपरिक ओरण भूमि के संरक्षण को लेकर वर्षों से चल रहा संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल को 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी, जिसमें ओरण को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक अधिकारों के रूप में संरक्षण देने की मांग की गई है। सोलर-विंड प्रोजेक्ट्स से बढ़ते खतरे और 75 दिनों से जारी 725 किमी की पदयात्रा के बीच यह सुनवाई आस्था आधारित पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ा फैसला साबित हो सकती है। अनुच्छेद 25-26 के तहत संरक्षण की मांग
याचिका में कहा गया है कि ओरण केवल सरकारी रिकॉर्ड में 'डीम्ड फॉरेस्ट' नहीं हैं, बल्कि यह भूमि-आधारित धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ग्रामीण समुदायों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के पालन का अधिकार है। परंपराओं के अनुसार ओरण में पेड़ों की कटाई और शिकार पूरी तरह प्रतिबंधित है, इसलिए इन्हें ‘अनिवार्य धार्मिक अभ्यास’ मानते हुए संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग की गई है। सोलर-विंड प्रोजेक्ट्स से बढ़ा खतरा
जैसलमेर और आसपास के क्षेत्रों में सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के विस्तार के कारण ओरण भूमि पर संकट बढ़ गया है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इन क्षेत्रों को धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण देता है, तो परियोजनाओं के नाम पर होने वाली जमीन आवंटन प्रक्रिया और पेड़ों की कटाई पर रोक लग सकती है। एडवोकेट धर्मवीर सिंह ने कहा कि यह सुनवाई ओरणों को मौलिक अधिकारों का संरक्षण दिलाने की दिशा में अहम साबित हो सकती है। 75 दिनों की पदयात्रा से उठा जन-आंदोलन
तनोट माता मंदिर से शुरू हुई 725 किलोमीटर लंबी 'ओरण बचाओ पदयात्रा' पिछले 75 दिनों से लगातार जारी है। पदयात्री पार्थ जगाणी के अनुसार यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत का है जिसे सदियों से ‘ईश्वर का बगीचा’ मानकर संरक्षित किया गया है। इस जन-आंदोलन ने अब राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है और सुनवाई को लेकर पूरे पश्चिमी राजस्थान में उत्सुकता बनी हुई है। क्या होती है ओरण भूमि
राजस्थान की ग्रामीण परंपरा में ओरण ऐसी भूमि होती है जिसे किसी देवी-देवता या संत के नाम समर्पित किया जाता है। यहां पेड़ काटना, लकड़ी जलाना या शिकार करना पूरी तरह वर्जित होता है। यहां तक कि गिरे हुए पत्तों को भी नहीं हटाया जाता। ये क्षेत्र जैव विविधता के केंद्र होते हैं, जहां गोडावण, हिरण और नीलगाय जैसे वन्यजीवों को शरण मिलती है। अकाल के समय ये क्षेत्र पशुपालकों के लिए चरागाह और जल स्रोत का मुख्य आधार बनते हैं। जैसलमेर में ओरण संघर्ष की पृष्ठभूमि
जैसलमेर में ओरण को लेकर संघर्ष पिछले कुछ वर्षों में तेज हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड में इन जमीनों को अक्सर बंजर या वेस्टलैंड दर्ज कर सोलर कंपनियों को आवंटित किया गया, जिससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ी। खेजड़ी और जाल जैसे पुराने पेड़ों की कटाई शुरू होने पर विरोध तेज हुआ और यह आंदोलन जन-आंदोलन में बदल गया। सोलर हब बनाम लोक आस्था
सोलर हब के रूप में विकसित हो रहे जैसलमेर में सौर परियोजनाओं और हाई-टेंशन लाइनों के कारण न केवल चरवाहों के रास्ते प्रभावित हुए हैं, बल्कि गोडावण जैसे दुर्लभ पक्षियों के अस्तित्व पर भी खतरा पैदा हुआ है। कानूनी लड़ाई और आगे की राह
ग्रामीणों ने मांग उठाई है कि ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में उसी नाम से दर्ज किया जाए और इसे वन कानून के बजाय धार्मिक संपत्ति का दर्जा दिया जाए। 75 दिनों की पदयात्रा और कानूनी प्रयासों के बाद यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच तक पहुंच गया है। यह लड़ाई केवल जमीन बचाने की नहीं, बल्कि उस परंपरा और जीवन शैली को बचाने की है, जिसने सदियों से पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया है।