बी-2 बाइपास स्थित श्रीराम कॉलोनी से जुड़ी विवादित करीब 42 बीघा जमीन के मामले में हाईकोर्ट ने हाउसिंग बोर्ड के पक्ष में फैसला दिया है। कोर्ट ने जेडीए की ओर से 29 मई 1995 को दी गई योजना स्वीकृति और इसके बाद के आदेशों को अवैध माना है। 31 जुलाई 1981 के समझौता विक्रय को भी अवैध मानते हुए शून्य घोषित कर दिया। जस्टिस गणेश राम मीणा ने बोर्ड की याचिका मंजूर करते हुए निजी पक्ष की 3 याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि संबंधित भूमि के अधिग्रहण की कार्रवाई बोर्ड के पक्ष में पूर्ण मानी जाएगी। समझौता विक्रय से स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता। धोखाधड़ी से प्राप्त कोई भी आदेश, भले वह अंतिम रूप ले चुका हो, वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि 12 फरवरी 2002 को एकलपीठ से गलत तथ्यों के आधार पर आदेश प्राप्त किया गया था, इसलिए रद्द किया जाता है। कोर्ट ने 1986 की ऑडिट रिपोर्ट और 25 जुलाई 2019 की जांच समिति रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अधिग्रहण से पहले ऐसी कोई योजना अस्तित्व में नहीं थी। समिति ने मूल खातेदारों को भी पक्षकार नहीं बनाया था। कोर्ट ने कहा कि मूल खातेदार सिविल कोर्ट में जमा मुआवजा राशि के लिए आवेदन कर सकते हैं। बोर्ड को अन्य विधिक कार्रवाई की भी स्वतंत्रता दी है। NOC लेकर जेडीए नियमन की तैयारी में था, तत्कालीन आयुक्त ने रोका था ग्राम चैनपुरा एवं दुर्गापुरा की 42 बीघा 10 बिस्वा भूमि के संबंध में जवाहरपुरी गृह निर्माण सहकारी समिति ने सदस्यों के पक्ष में नियमितीकरण की प्रक्रिया जेडीए में प्रारंभ कर दी थी। वर्ष 2019 में हाउसिंग बोर्ड भी जेडीए को इसके नियमितीकरण के लिए एनओसी देने की तैयारी में था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 5 भूखंडधारियों के मामले में यह निर्देश दिया था कि हाउसिंग बोर्ड द्वारा सिविल न्यायालय में जमा कराई गई मुआवजा राशि बोर्ड को वापस लौटा दी जाए। तब पवन अरोड़ा ने हाउसिंग बोर्ड आयुक्त की जिम्मेदारी संभालते प्रकरण की जांच कर एनओसी रोक दी। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण (अवाप्ति) को निरस्त नहीं किया था। इस आधार पर रिट याचिका भी दायर की गई। ₹2200 करोड़ की इस जमीन पर जल्द कब्जा की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।