‘जंगल का कानून’... इसे नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है, लेकिन राजस्थान-एमपी सीमा पर बांसवाड़ा जिले के जंगल का कानून ऐसा है, जिसने 5 गांवों के लोगों को नशामुक्त कर दिया है। इस जंगल में नशे का सामान लेकर प्रवेश करने पर प्रतिबंध है। जंगल शुरू होते ही ‘भांग वाला भाटा’ नाम की जगह है। जो भी जंगल में घुसता है, उसे नशे का सामान यहीं छोड़ना होता है। यह जगह कुशलगढ़ के हाथिया दिल्ली गांव के पास है। बुजुर्ग थावराभाई बताते हैं, इस स्थान पर नशे में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। तब से पुरखों ने यह कानून लागू कर दिया। पेड़ के नीचे प्रस्तर स्थापित कर आस्था से जोड़ दिया। ऐसे में लोग बीड़ी-सिगरेट, पान, गुटखा, शराब आदि वहां छोड़ने लगे। “5 गांवों के लोग जंगल से होकर अपने घर आते-जाते हैं। लोगों का कहना है कि इस कानून ने उन्हें कभी नशा न करने को प्रेरित किया।” -गिरीश लबाना, क्षेत्रीय वन अधिकारी, कुशलगढ़ रेंज 350 हैक्टेयर में फैले जंगल में कभी हरी डालियां नहीं काटी जातीं वनरक्षक परसिंह डिंडोर बताते हैं- 350 हैक्टेयर में फैला जंगल राजस्थान और मप्र को जोड़ता है। वन अधिकारी भी यहां नशे की सामग्री देखकर चौंक जाते हैं। वनपाल दिनेश डामोर और वन रक्षक नागेंद्र कटारा ने बताया- ‘भांग वाला भाटा’ से 3-4 किमी दूरी पर मप्र शुरू हो जाता है। यहां केवल पगडंडी है, लेकिन शॉर्टकट होने से 6-7 गांव-ढाणियों के लोग यहीं से जाते हैं। कई लोग ‘भांग वाला भाटा’ पर नारियल भी चढ़ाते हैं। यहां स्थानीय लोग हरी डालियां कभी नहीं काटते। जानवरों के जंगल से बाहर आने से रोकने के लिए कानून