पश्चिमी राजस्थान की भाग्यरेखा कही जाने वाली राजस्थान रिफाइनरी परियोजना अब अपने उद्घाटन के मुहाने पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 21 अप्रैल को देश की इस सबसे हाईटेक रिफाइनरी का लोकार्पण करने जा रहे हैं, लेकिन, उद्घाटन के इस उत्साह के बीच प्रोजेक्ट की आसमान छूती लागत और राज्य सरकार पर पड़ने वाला वित्तीय भार एक बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रोजेक्ट की शुरुआत से जुड़े रहे तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब राज्य सरकार को एचपीसीएल के साथ हुए इंसेंटिव समझौते पर पुनर्विचार करना चाहिए। 4 साल की देरी से 43 हजार करोड़ से 80 हजार करोड़ पहुंच गई लागत साल 2018 में जब इस रिफाइनरी प्रोजेक्ट का शिलान्यास हुआ था, तब इसकी अनुमानित लागत 43,229 करोड़ थी। लेकिन प्रोजेक्ट में हुए करीब 4 साल के विलंब के कारण यह बजट अब लगभग 80,000 करोड़ तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, लागत में यह 100% की वृद्धि राज्य के खजाने पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है। प्रोजेक्ट में देरी की वजह से लागत 10-15% बढ़ने की स्थिति में भी इंसेंटिव दे सकते हैं, लेकिन रिफाइनरी की लागत डबल हो गई। इस पर फिर से पुनर्विचार करना चाहिए। वित्तीय भार शून्य होना चाहिए यह देश की पहली एकीकृत पेट्रोकेमिकल परियोजना है, जो 5 लाख रोजगार पैदा करेगी। लेकिन जब लागत 10-15% के बजाय सीधे डबल हो गई है, तो राज्य सरकार पर इंसेंटिव का बोझ बना रहना तर्कसंगत नहीं है। निदेशालय स्तर पर टेक्नो-इकोनॉमिक अध्ययन कर इस वित्तीय भार को शून्य करने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है, ताकि राज्य के हितों की रक्षा हो सके। पचपदरा रिफाइनरी का संचालन भले ही ऑटोमेटेड हो, लेकिन सहायक उद्योगों के माध्यम से यहां 5 लाख से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। विशेषज्ञ निदेशक होने से हम भविष्य में तकनीकी रूप से प्रभावी इन्वेस्टर्स मीट कर पाएंगे, जिससे बाड़मेर और आसपास के क्षेत्रों में पेट्रोकेमिकल हब विकसित होगा। भास्कर एक्सपर्ट - डॉ. बीएस राठौड़, पूर्व पेट्रोलियम निदेशक भास्कर इनसाइट - 16845 करोड़ इंसेंटिव का गणित रिफाइनरी स्थापना के दौरान पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने शुरुआत में 56,000 करोड़ के इंसेंटिव का प्रस्ताव रखा था, जिसे बाद में 2018 में भाजपा सरकार ने तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर घटाकर 16,845 करोड़ कर दिया। सरकार ने हर साल 1123 करोड़ रुपए 15 साल तक इंसेंटिव देना तय किया था। इससे राज्य को 40,000 करोड़ की बचत तो हुई, लेकिन अब लागत डबल होने के बाद इस बचे हुए इंसेंटिव को भी देने पर सवाल उठ रहे हैं। क्या 80 हजार करोड़ रुपए लागत हो जाने के बाद भी सरकार को 16845 करोड़ रुपए के इंसेंटिव का भार उठाना चाहिए। तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, यदि राज्य सरकार रणनीतिक कदम उठाती है, तो दो मोर्चों पर बड़ी बचत की जा सकती है। बढ़ी हुई लागत के आधार पर पुराने 16,845 करोड़ के वित्तीय भार को शून्य करने का प्रयास भी होना चाहिए। रिफाइनरी जैसा हाई-टेक प्रोजेक्ट सामान्य प्रशासनिक प्रबंधन के बजाय गहरी तकनीकी समझ की मांग करता है। सरकार में पेट्रोलियम निदेशक का पद पिछले 3-4 साल से ​रिक्त है।