आईजीएनपी एरिया में इन दिनों पानी की किल्लत बड़ा मुद्दा बना है। चौतरफा आंदोलन की चिंगारी सुलग रही है। दिसंबर 1981 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मध्यस्थता में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच हुआ रावी-ब्यास जल समझौता दस्तावेजों तक सीमित होकर रह गया है। 17.17 एमएएफ सरप्लस पानी में से राजस्थान का 8.60 एमएएफ हक तय होने के बावजूद पश्चिमी राजस्थान की जीवन-रेखा इंदिरा गांधी नहर (इगानप) को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। अंतर्राज्यीय समझौतों की अनदेखी, बुनियादी ढांचे की कमियों और हेडवर्क्स का नियंत्रण भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) को न सौंपे जाने से बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, श्रीगंगानगर और अनूपगढ़ समेत 10 जिलों में कृषि एवं पेयजल संकट गहरा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भेजे गए दस्तावेजों में बीकानेर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि 2018 में केंद्र सरकार ने रावी नदी पर शाहपुरकंडी बांध निर्माण की मंजूरी पंजाब और जम्मू-कश्मीर को जारी की। 1981 के अंतर्राज्यीय समझौते और इराडी ट्रिब्यूनल की सिफारिशों के तहत बाध्यकारी प्रावधान होने के बावजूद इस बहुउद्देशीय परियोजना की पूरी रूपरेखा में राजस्थान को पक्षकार ही नहीं बनाया गया। यह सीधा-सीधा 1981 के त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन है। इससे पहले 1998 में रावी नदी पर थीन (रणजीत सागर) बांध बनने और उसमें जल भराव शुरू होते ही नहर के टेल एरिया में जल प्रवाह अचानक गिर गया था। इसके कारण रावला, घड़साना, अनूपगढ़ और खाजूवाला क्षेत्र में सिंचाई पानी का प्रवाह ठप हो गया। जिससे सीमावर्ती बेल्ट की उपजाऊ जमीनें बंजर होने लगीं और इस पूरे क्षेत्र से करीब 60 प्रतिशत आबादी को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था। अधिनियम का उल्लंघन, चारों हेडवर्क्स पर पंजाब का कब्जा पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 79 के तहत तीनों नदियों (सतलुज, रावी और ब्यास) से जुड़े चार मुख्य नियंत्रक परिसंपत्तियों माधोपुर, रोपड़, हरिके और फिरोजपुर हेडवर्क्स का प्रशासनिक एवं भौतिक नियंत्रण बीबीएमबी को सौंपा जाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके बावजूद पंजाब सरकार ने इन चारों सामरिक हेडवर्क्स का नियंत्रण अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है। परिणामस्वरूप जब भी पंजाब में पानी की कमी होती है, तो राजस्थान के हिस्से की कटौतियां सबसे पहले कर दी जाती है। 1981 के समझौते में तय 8.60 एमएएफ पानी मिलना राजस्थान का विधिक अधिकार है। शाहपुरकंडी परियोजना से राजस्थान को बेदखल करना और हरिके पर 3,500 क्यूसेक का लिंक चैनल न बनाना पंजाब की एकतरफा नीति को दर्शाता है। जब तक चारों हेडवर्क्स का नियंत्रण कानूनी प्रावधानों के तहत बीबीएमबी के पास नहीं जाएगा, तब तक इगानप के अंतिम छोर तक पूरा पानी पहुंचना असंभव है। -नरेन्द्र आर्य, सामाजिक कार्यकर्ता (इगानप सिंचित क्षेत्र, खाजूवाला) अब भी पाकिस्तान जा रहा मानसून का अतिरिक्त पानी इंदिरा गांधी नहर फीडर की स्वीकृत क्षमता 18,500 क्यूसेक है। हालांकि पंजाब ने 1955 में हरिके हेडवर्क्स पर महज 15,000 क्यूसेक क्षमता के गेट बनाए थे। शेष 3500 क्यूसेक क्षमता बढ़ाने के लिए फरवरी 2011 में राजस्थान विधानसभा की जनलेखा समिति के साथ हुई वार्ता में बीबीएमबी ने हरिके में गुरुद्वारा साहिब के पास नए गेट और लिंक नहर बनाने का लिखित आश्वासन दिया था, जो 15 साल बाद भी कागजों में दबा है। नहर विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस पूरे फीडर की री-मॉडलिंग कर क्षमता 20,000 क्यूसेक की जाए और हरिके हेडवर्क्स पर 5,000 क्यूसेक क्षमता का नया रेगुलेटर गेट निर्मित हो तो हर मानसून में व्यर्थ बहकर पाकिस्तान जाने वाले करोड़ों क्यूसेक अतिरिक्त जल को रोका जा सकता है। इस पानी को आसानी से इगानप की सूरतगढ़, अनूपगढ़, घग्घर शाखाओं और एस्केपों में डायवर्ट करके राजस्थान के सूखे तालाबों और कृषि खेतों को दिया जा सकता है।