मैं साल 2009 से उस दुनिया का हिस्सा हूं, जो आवाजों से नहीं, एहसासों और इशारों से चलती है। वैसे तो मैं बचपन से ही इन बच्चों से जुड़ी हुई हूं, क्योंकि मेरे परिवार में भी दो बच्चे सुन नहीं सकते थे। ज्यादातर वही लोग इंटरप्रेटर बनते हैं जिनका इन बच्चों से कोई जुड़ाव होता है। मैं जिस कॉलेज में इंटरप्रेटर हूं, वहां 500-600 डेफ बच्चे पढ़ते हैं। मेरा काम है टीचर की हर बात को साइन लैंग्वेज में बदलना। चाहे विषय हिंदी हो, इंग्लिश हो, पॉलिटिकल साइंस या हिस्ट्री, हर शब्द को इशारों में ढालना पड़ता है, लेकिन असली चुनौती तब आती है, जब कोई ऐसा शब्द सामने होता है, जिसका कोई साइन ही नहीं है जैसे इंटर्नशिप तब हमें शब्द नहीं, पूरी कहानी समझानी पड़ती है, उदाहरण देकर, तस्वीरें दिखाकर।इन बच्चों को हर जगह कोई न कोई चुनौती झेलनी पड़ती है। एक दिन मेरी एक स्टूडेंट के पेट में दर्द था, वह अस्पताल गई, लेकिन उसकी बात कोई नहीं समझ पाया, वह पूरा दिन यूं ही दर्द में भटकती रही। कई बार स्टूडेंट्स इस तरह की ​शिकायत लेकर आते हैं कि उन्हें अस्पताल में प्रा​थमिक इलाज भी नहीं मिल पाता। किसी भी अस्पताल और पुलिस थाने में इंटरप्रेटर नहीं हैं। राजस्थान में मात्र 20 अनुभवी प्रोफेशनल इंटरप्रेटर होंगे। आए दिन बच्चों के साथ छेड़छाड़ के मामले होते हैं। वे तुरंत हमें आकर बताते हैं, क्योंकि उनकी बात समझने वाला कोई और नहीं है। छेड़छाड़ या मारपीट के मामलों में जब हम इन बच्चों की मदद के लिए थाने या कोर्ट जाते हैं, तो हमें ही गवाह बना दिया जाता है और सालों तक कोर्ट के चक्कर लगवाए जाते हैं। एक बार तो मैं प्रेग्नेंसी के कारण नहीं जा पाई थी तो पुलिस वालों ने मुझ पर काफी दबाव बनाया। इनके लिए काम करते हुए अक्सर मेरा मन भारी हो जाता है। अकेलापन, इनकी जिंदगी का सबसे भारी शब्द है। इन्हें घर में भी कोई समझने वाला नहीं होता है। बहुत कम पेरेंट्स ऐसे हैं, जो साइन लैंग्वेज सीखने में रुचि दिखाते हैं। ज्यादातर बच्चों के साथ घर पर ही भेदभाव किया जाता है, कई बच्चे तो मेरे पास ये शिकायत लेकर आते हैं कि उन्हें घर पर ठीक से खाना नहीं दिया जाता। घर में लोग हंसते-बोलते हैं और ये चुपचाप देखते रहते हैं। उन्हें लगता है कि शायद उनका मजाक उड़ाया जा रहा है, क्योंकि वे सुन नहीं सकते। धीरे-धीरे उनकी यह चुप्पी गुस्से में बदल जाती है। घर के बाहर भी उन्हें बहुत दिक्कतें हैं। रोडवेज बस वाले इन्हें देखकर बस तक नहीं रोकते, क्योंकि ये फ्री पास पर सफर करते हैं। फिर भी ये बेहद ईमानदार होते हैं। रात के 3 बजे भी किसी एक को मदद चाहिए, तो पूरा ग्रुप उसके साथ खड़ा हो जाता है। ये घंटों इशारों में हंसते-बतियाते हैं और उन्हें यूं खुलकर जीते हुए देखना ही मेरे प्रोफेशन का सबसे सुखद अनुभव है। -जैसा ईशा सिंह को बताया