मेवाड़ अंचल का प्राचीन, पवित्र और आध्यात्मिक आदिवासी लोकनाट्य गवरी अब केवल ग्रामीण अंचलों तक सीमित नहीं रहा है। 40 दिनों तक चलने वाली भक्ति, कठोर साधना और लोक-कला की यह अनूठी परंपरा अब मेवाड़ की सीमाओं को लांघकर नए शिखर छू रही है। यह पहला मौका है जब गवरी का मंचन इतने भव्य रूप में राजस्थान से बाहर आयोजित हो रहा है। गुजरात के अहमदाबाद एयरपोर्ट के पास पानी कोटड़ा के कलाकारों द्वारा दी गई गवरी की जोरदार प्रस्तुति के बाद, अब प्रसिद्ध कलाकार किशन पनौतिया और बड़ी सादड़ी की गवरी टीम का शो (19 सितंबर को बड़ौदा और 20 सितंबर को अहमदाबाद में) आयोजित किया गया। शहरी-कॉर्पोरेट वर्ग में आदिवासी कला को देखने की उत्सुकता बढ़ी अहमदाबाद-बड़ौदा जैसे बड़े महानगरों में गवरी का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि अब शहरी-कॉर्पोरेट वर्ग में भी इस पारंपरिक आदिवासी कला को देखने-समझने की उत्सुकता बढ़ी है। मांदल-कांस्य की थाली की थाप पर कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने गुजरात के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। सोशल मीडिया पर धूम यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने गवरी को एक नया दर्शक वर्ग दिया है। गवरी की पारंपरिक वेशभूषा, अनूठे मुखौटे, डमरू और थाली की थाप पर कलाकारों के नृत्य की रील्स सोशल मीडिया पर लाखों बार देखी जा रही हैं। डिजिटल मीडिया के प्रसार से आज की युवा पीढ़ी और विदेशी पर्यटक भी इस 40 दिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान को देखने के लिए विशेष रूप से मेवाड़ पहुंच रहे हैं। 40 दिन के कड़े नियम और आध्यात्मिक अनुष्ठान वही बता दें, भगवान शिव और माता पार्वती (गौरी) की आराधना पर आधारित यह लोकनृत्य कड़े नियमों, निर्जला उपवास और सात्विक जीवन शैली के लिए जाना जाता है। गवरी के कलाकार 40 दिनों तक नंगे पैर रहते हैं, एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं तथा हरी सब्जी, फल, मांस-मदिरा और चमड़े की वस्तुओं का त्याग करते हैं। कलाकार हाथ से बने विशेष मुखौटे और बहुरंगी पारंपरिक वेशभूषा धारण करते हैं। सभी पात्र केवल पुरुष कलाकारों द्वारा ही निभाए जाते हैं।