12 साल की उम्र में ट्रेन हादसे में दोनों पैर गंवाने वाली यूपी के बहराइच की रहने वाली 26 साल की चांदनी 14 साल बाद फिर से अपने पैरों पर चलने लग गई है। उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान ने चांदनी को जापानी और जर्मन तकनीक से बने 3D प्रिंटेड कृत्रिम पैर लगाकर नई जिंदगी दी है। नारायण सेवा संस्थान के प्रयासों और कृत्रिम अंगों की सहायता से वह अब आत्मविश्वास के साथ चलने लगी हैं। वर्षों तक दर्द और संघर्ष झेलने के बाद चांदनी की नई शुरुआत न केवल उनके लिए, बल्कि दिव्यांगजनों के लिए भी उम्मीद और प्रेरणा की मिसाल बन गई है। 12 साल की उम्र में ट्रेन हादसे में चांदनी के दोनों पैर कट गए थे। पिछले 14 सालों से वह बिना पैरों के ही जीवन जी रही थीं। अब संस्थान में कृत्रिम पैर लगने और सही ट्रेनिंग मिलने के बाद वह एक बार फिर से अपने पैरों पर चलने लगी हैं। दरअसल, घटना तब की है जब 12 साल की चांदनी अपने चाचा के साथ नाना के घर जा रही थीं। स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ते समय अचानक उनका संतुलन बिगड़ गया और वह नीचे गिर गईं। इससे पहले कि वह संभल पातीं, ट्रेन चल पड़ी और हादसे में घुटनों तक उनके दोनों पैर कट गए। अस्पताल में इलाज मिलने से जख्म तो भर गए, लेकिन इस हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदलकर रख दी। उदयपुर का नारायण सेवा संस्थान बना सहारा हादसे के बाद चांदनी अगले 14 साल तक घर में ही कैद होकर रह गईं। बिना किसी सहारे के चलना तो दूर, वह अपने रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी खुद नहीं कर पाती थीं। दूसरों पर निर्भर रहने की वजह से वह काफी परेशान रहती थीं। जब भी वह बाहर लोगों को अपने पैरों पर चलते देखती थीं तो उनके मन में भी यही इच्छा होती थी कि काश वह भी एक बार फिर से चल पाती। करीब एक महीने पहले चांदनी के परिवार को उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद परिवार बिना देर किए उन्हें लेकर उदयपुर संस्थान पहुंचा। यहां डॉक्टरों की टीम ने चांदनी के पैरों का नाप लिया और जापानी व जर्मन तकनीक का इस्तेमाल करके 3D प्रिंटेड 'नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिम्ब' तैयार किए। कृत्रिम पैर लगाने के बाद अपने पैरों पर चलने लगी चांदनी कृत्रिम पैर लगाने के बाद चांदनी को संस्थान में ही कुछ दिनों तक चलने-फिरने का अभ्यास कराया गया। लगातार ट्रेनिंग और अपनी मेहनत के दम पर अब चांदनी बिना किसी सहारे के आत्मविश्वास के साथ अपने पैरों पर चलने लगी हैं। वह अपने ज्यादातर काम खुद ही कर रही हैं। 14 साल के लंबे इंतजार के बाद अपने पैरों पर दोबारा खड़ा होना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। सही समय पर संस्थान से मिले सहयोग ने उनके चेहरे पर फिर से मुस्कान लौटा दी है।