नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम 17 अप्रेल को लोकसभा में पास नहीं हो सका। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ वोटिंग की थी। इसके बाद बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने पूरे देश में कांग्रेस और विपक्षी दलों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा था। इसी के तहत बीजेपी शासित राज्यों को निर्देश दिए गए थे कि वे अपने यहां विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करवाए। केन्द्र ने इसकी डेडलाइन 30 अप्रैल तय की थी। लेकिन राजस्थान सरकार में इस पर काम भी शुरू नहीं हुआ हैं। यूपी, एमपी और उत्तराखंड ने पास किया प्रस्ताव इसके विपरीत उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड की बीजेपी सरकारें विशेष सत्र बुलाकर निंदा प्रस्ताव पास कर चुकी है। वहीं, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सरकारों ने निंदा प्रस्ताव पारित करने के लिए विशेष सत्र बुला लिए हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने तो निंदा प्रस्ताव पारित करने के साथ विधानसभा ने एक सरकारी संकल्प भी पारित किया। इसमें परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संसद और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग की गई। पंचायत से लेकर विधानसभा तक विशेष सत्र केंद्रीय नेतृत्व के स्पष्ट निर्देश थे कि 30 अप्रैल तक ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा तक विशेष सत्र बुलाकर कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। लेकिन प्रदेश में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। प्रदेश में अधिकतर पंचायतों और नगर निकायों का कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में वहां भी विशेष सत्र नहीं बुलाया जा सका है। विशेष विधेयक के हवाले से बुलाना होगा सत्र जानकारों का मानना है कि विधानसभा सत्र किसी खास विधेयक, राजनीतिक प्रस्ताव, आपात स्थिति पर चर्चा और निर्णय लेने के लिए ही बुलाया जा सकता है। कैबिनेट इसकी सिफारिश करती है। इसके बाद विधानसभा सचिवालय विधायकों को नोटिस जारी करता है। हालांकि नोटिस अवधि को लेकर कोई निश्चित संवैधानिक समय सीमा तय नहीं है। लेकिन सामान्यत 7 दिन पहले तो सूचना दी ही जाती है। लेकिन सरकार के साथ दिक्कत है कि वह केवल निंदा प्रस्ताव पास कराने के लिए सत्र नहीं बुला सकती है, उसे सत्र बुलाने के लिए किसी विशेष विधेयक को पास कराने का सहारा लेना होगा।