राजस्थान के अजमेर से महज 22 किलोमीटर दूर नसीराबाद के दिलवाड़ा गांव में 120 लड़कियां फुटबॉलर हैं। कई नेशनल, स्टेट लेवल चैंपियन हैं। शाम 7 बजे गांव के स्टेडियम में फ्लड लाइट जल जाती है। लड़कियां प्रैक्टिस करने 5 बजे ही पहुंच जाती हैं। यह वही स्टेडियम है, जो इन्होंने खुद अपने हाथों से बनाया था, जब 8 साल पहले जिला स्तरीय मैच में उन्हें मैदान में ही नहीं घुसने दिया गया था।शेष | पेज 4 दरअसल साल 2018 में जिला स्तरीय मैच के दौरान दिलवाड़ा के खिलाड़ियों को ‘बाहरी’ बताकर खेलने से रोक दिया गया था। खिलाड़ी टूटे मन से लौटे। मंदिर की उबड़-खाबड़ जमीन को मैदान बनाने में जुट गए। उनके साथ ग्रामीणों ने भी एक साल तक पसीना बहाया। उन्होंने अपने गांव में 100x65 मीटर का शानदार फुटबॉल मैदान तैयार कर लिया। तब यहां गांव की सिर्फ 5 लड़कियों ने फुटबॉल की प्रैक्टिस शुरू की। अब यहां 120 लड़कियां फुटबॉलर हैं। इसके अलावा 30 लड़के भी हैं। अब गांव के लोग खेलों में अपने बच्चों का भविष्य देखने लगे हैं। गांव की बहुएं भी शाम ढलते ही घर के सारे काम निबटाकर मैदान में प्रैक्टिस करने पहुंच जाती हैं। सूरज ढलते ही गांव की 120 लड़कियां मैदान पर पहुंच जाती हैं गांव की 120 लड़कियां हर शाम 5 बजे फुटबॉल किट पहनकर उतरती हैं। इनमें कृष्णा जाट गांव की एकमात्र नेशनल प्लेयर (U-17, U-14) है। सोनिया चौधरी स्टेट विनर हैं। वह घर का काम और मवेशियों को चारा डालने के बाद ही मैदान जा पाती हैं। इसके अलावा सोनम के पिता नहीं हैं। बड़ी बहन होने के नाते घर के कामों में मम्मी का भी हाथ बंटाती हैं। स्टेट लेवल पर खेल चुकी हैं। अंजू चौधरी जिला स्तरीय तैयारी कर रही हैं। वह घर में गाय-भैंसों की जिम्मेदारी संभालते हुए खेल रही हैं। अब तक 8 खिलाड़ी जिला स्तर और 7 राज्य स्तर तक खेल चुकी हैं। यहां सब्जी बेचने वाला कोच, खिलाड़ियों को ड्राइवर बताता है डायट दिलवाड़ा की ये क्रांति वे लोग लाए हैं, जिन्होंने खुद कभी खिलाड़ी बनने का सपना देखा था, लेकिन मौका नहीं मिला। ड्राइवर राकेश प्रजापत खिलाड़ियों के लिए किट और डाइट की व्यवस्था करते हैं। सर्टिफाइड कोच जयंत दिन भर फल बेचते हैं। शाम को मैदान पर पसीना बहाते हैं। वर्कशॉप संचालक ओम मेघवंशी खिलाड़ियों को तकनीकी गुर सिखाते हैं।