भास्कर न्यूज | जैसलमेर अक्षय द्वितीया आखा बीज का पर्व रविवार को पूजा-अर्चना, उत्साह के साथ मनाया गया। महिलाओं ने सुबह जल्दी उठकर पीपल की पूजा की। घर में खळों की पूजा की। आखा बीज का प्रसिद्ध भोजन खीच बनाया। खीच के साथ बड़ी ग्वार फली की सब्जी भी बनी। पुरुष, बच्चे भी सुबह स्नान के बाद पूजा में लगे। लोग एक-दूसरे के घर पहुंचे। खीच खाकर पर्व मनाया। आखा बीज, तीज के दिन खळों के स्थान पर रखे दर्पण के सामने कुमकुम-अक्षत से परिवार के हर सदस्य ने भाल पर तिलक लगाया। स्नान, ध्यान, पूजा-पाठ के बाद वर्ष पर्यंत व्यक्तिगत, पारिवारिक संपन्नता के निमित कुमकुम-अक्षत का तिलक धारण किया। जैसलमेर में आखा बीज, आखा तीज मनाने की अनूठी परंपराएं हैं। रविवार को चैनपुरा, जगाणी पाड़ा सहित कई मोहल्लों में आखा बीज हर्षोल्लास से मनाई गई। आखाबीज के दिन हर घर में पंचधान के खळे बनाए गए। पूजा के स्थान या किसी पवित्र, सुरक्षित जगह पर दैनिक जीवन में उपयोगी पांच धान की अलग-अलग ढेरियां लगाई गईं। बीच की ढेरी पर तांबे के कलश में पवित्र, शुद्ध जल भरा गया। कलश पर मोली बंधा नारियल रखा गया। इसी स्थल पर दर्पण रखा गया। पात्र में कुमकुम, चावल रखे गए। खळे घर की बुजुर्ग महिला ने अक्षय आकांक्षा के साथ रखे। मान्यता रही कि जैसे आखाबीज, आखातीज सर्वदोष रहित त्योहार हैं। जीवन में अक्षयता की कल्पना को साकार करते हैं। वैसे ही खळों के रूप में रखा धान खेत-खलिहानों में निरंतर उपजता रहे। घर-परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में सहायक बने। रासला. नया रासला गांव में अक्षय तृतीया पर पारंपरिक सामूहिक भोज हुआ। गांव के बुजुर्ग, युवा एक साथ बैठे। सामाजिक एकता, भाईचारे का संदेश दिया। परंपरा के अनुसार ग्रामीण अपने-अपने घर से बाजरे का खीच लेकर पहुंचे। सभी ने सामूहिक रूप से सेवन किया। बुजुर्गों ने युवा पीढ़ी को आखातीज का महत्व बताया। लोक संस्कृति की जानकारी दी।