अजमेर नगर निगम के दूसरे चरण में शुक्रवार को 80 वार्डों के लिए मतदान हुआ। शाम 6 बजे वोटिंग खत्म होने तक 63.65% मतदान दर्ज किया गया। यानी शहर की सरकार चुनने के लिए करीब दो-तिहाई मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। 360 प्रत्याशियों का भविष्य अब EVM में कैद है। मतदान प्रतिशत ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की धड़कनें बढ़ा दी है, क्योंकि पिछली बार 2021 में 66.17% वोटिंग हुई थी। इस बार मतदान 2.52 प्रतिशत अंक कम रहा है। 2010 के मुकाबले 8.85 प्रतिशत ज्यादा वोटिंग अजमेर नगर निगम के चुनावी इतिहास में 2026 का 63.65% मतदान 2005 के बाद तीसरा सबसे ज्यादा है। 2005 में 57.80%, 2010 में 54.80%, 2015 में 62.78% और 2021 में 66.17% मतदान हुआ था। यानी 2010 के बाद लगातार दो चुनाव में वोटिंग बढ़ी, लेकिन इस बार फिर गिरावट आई। यानी 2010 के 54.80% के मुकाबले इस बार मतदान करीब 8.85 प्रतिशत अंक ज्यादा है, लेकिन 2021 के रिकॉर्ड 66.17% से पीछे रह गया। खास बात यह है कि इस बार मुकाबला कई वार्डों में कांटे का माना जा रहा है। ऐसे में कुछ वार्डों में कुछ दर्जन या कुछ 100 वोटों का अंतर भी जीत-हार तय कर सकता है। कम मतदान वाले वार्डों में यह अंतर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। 2021 के मुकाबले 2.52% कम वोटिंग, लेकिन तस्वीर आसान नहीं 2021 में 66.17% मतदान हुआ था और भाजपा ने 80 में से 79 वार्डों के चुनाव में 47 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 18, निर्दलीयों को 13 और रालोपा को 1 सीट मिली थी। एक वार्ड में भाजपा प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुई थीं। इस बार भाजपा ने 80 में से 79 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि कांग्रेस के 77 प्रत्याशी मैदान में हैं। बाकी सीटों पर निर्दलीय और अन्य दलों के प्रत्याशी मुकाबले में हैं। टिकट वितरण के बाद दोनों दलों में बगावत और निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने कई वार्डों का मुकाबला बहुकोणीय बना दिया है। यही वजह है कि निर्दलीय अहम यदि भाजपा या कांग्रेस बहुमत से कुछ सीट पीछे रह जाती है तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इस बार मैदान में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी होने के कारण परिणाम के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। खासकर उन वार्डों पर नजर रहेगी जहां भाजपा-कांग्रेस के साथ बागी या मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी भी मुकाबले में हैं। यदि ऐसे उम्मीदवार जीतते हैं तो बोर्ड बनाने के लिए उनकी राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है। 36 साल से भाजपा का बोर्ड, 2010 में कांग्रेस का मुखिया लेकिन बोर्ड भाजपा का अजमेर निकाय की राजनीति में पिछले साढ़े तीन दशक से भाजपा का दबदबा रहा है। 1990 में तत्कालीन नगर परिषद में भाजपा के रतनलाल यादव सभापति बने थे। इसके बाद 1995 में वीर कुमार, 2000 में अनिता भदेल और 2005 में धर्मेंद्र गहलोत सभापति बने। 2010 में कांग्रेस के कमल बाकोलिया सीधे निर्वाचन प्रक्रिया से मेयर बने, लेकिन उस समय भी बोर्ड में भाजपा का बहुमत था। 2015 में धर्मेंद्र गहलोत मेयर बने और 2021 में भाजपा की ब्रजलता हाड़ा अजमेर नगर निगम की पहली महिला मेयर बनीं। महापौर पद महिला के लिए अनारक्षित, इसलिए बढ़ेगी जोड़-तोड़ इस बार महापौर पद अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में परिणाम आने के बाद सिर्फ बहुमत का आंकड़ा ही महत्वपूर्ण नहीं होगा, बल्कि किस दल के पास मजबूत महिला पार्षदों का समीकरण है, यह भी मायने रखेगा। 14 सितंबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी। यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो परिणाम और महापौर चुनाव के बीच का समय बेहद अहम हो जाएगा। संभावित विजयी पार्षदों को एकजुट रखने के लिए दोनों दल रणनीति बना सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी दल ने आधिकारिक तौर पर बाड़ेबंदी की घोषणा नहीं की है। ये जानिए किस वार्ड में कितने वोट पडे़ सबसे अधिक वोट प्रतिशत वाले 5 वार्ड सबसे कम वोट प्रतिशत वाले 5 वार्ड