सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज ने एक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर बच्चों के डिजिटल मीडिया इस्तेमाल को लेकर देशभर के लिए नीति बनाने की मांग की है। इसमें स्कूलों में स्मार्टफोन पर रोक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक उम्र के आधार पर पहुंच की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी और उन पर जुर्माना तय होना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी बच्चे या माता-पिता पर नहीं डाली जानी चाहिए। ‘प्रिवेंशन बाय डिजाइन: फ्रॉम वॉलंटरी सेल्फ-रेगुलेशन टू अ स्टेट ड्यूटी ऑफ केयर’ रिपोर्ट न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक इवेंट में जारी की गई। यह कार्यक्रम ‘रिस्पॉन्सिबल AI एंड सेफ डिजिटल स्पेसेज फॉर चिल्ड्रन’ विषय पर हुआ था। रिपोर्ट में 40 से ज्यादा देशों में उम्र के आधार पर डिजिटल मीडिया बैन पर स्टडी की गई। रिपोर्ट में 110 देशों की स्कूलों में स्मार्टफोन से जुड़ी नीतियों की भी तुलना की गई। इसमें कहा गया है कि बच्चों की सुरक्षा अब प्लेटफॉर्म की स्वैच्छिक निगरानी का विषय नहीं रह सकती। यह अब सरकार की कानूनी जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसमें डिजिटल नुकसान रोकने के लिए पहले से व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया है। 52 देशों में स्कूलों में स्मार्टफोन पर रोक रिपोर्ट ने स्कूलों में स्मार्टफोन पर राष्ट्रीय स्तर पर रोक का समर्थन किया है। इसके अनुसार, 52 देशों में स्कूलों में स्मार्टफोन इस्तेमाल पर राष्ट्रीय कानून के तहत रोक है। 31 देशों ने ऐसी रोक के लिए नेशनल गाइडलाइन जारी की हैं। केवल 9 देशों में यह फैसला अलग-अलग स्कूलों पर छोड़ा गया है। रिपोर्ट में प्राइमरी और मिडिल स्कूल के दौरान छात्रों के स्मार्टफोन इस्तेमाल पर रोक की मांग की है। JRC के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा कि डिजिटल दुनिया में खतरा बढ़ गया है। इसे रोकने वाली व्यवस्थाएं इसके अनुसार अपडेट नहीं हो पाई हैं।
उन्होंने कहा, “डिजिटल दुनिया में नुकसान का स्तर बढ़ गया है, जबकि इसे रोकने वाली व्यवस्थाएं इसके साथ कदम नहीं मिला पाई हैं। सीमा पार होने वाले ऑनलाइन नुकसान से निपटने के लिए दुनिया को अनिवार्य रिपोर्टिंग और अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे की जरूरत है।” ऋभु ने कहा, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बच्चों को ऐसे अनुबंधों या व्यवस्थाओं में शामिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो उनके अधिकारों और सुरक्षा को कमजोर करें।” उन्होंने कहा, “18 साल से कम उम्र का बच्चा कानूनी रूप से किसी अनुबंध में शामिल नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी समझौता शुरू से ही अमान्य होता है।” उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में बच्चों की सुरक्षा और कानून के शासन के सिद्धांतों को तकनीक पर लागू किया गया है। ऋभु ने कहा, “डिजिटल प्लेटफॉर्म के स्तर पर हम कार्रवाई से पहले लाखों नुकसान होने का इंतजार नहीं कर सकते। हमें ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी, जो नुकसान रोकें।” उन्होंने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल जोखिमों की जल्द पहचान करने और बच्चों को सुरक्षा से जोड़ने के लिए किया जाना चाहिए। ऑनलाइन रीच पर उम्र की सीमा रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ साल पहले केवल कुछ देश बच्चों की ऑनलाइन पहुंच सीमित करने जैसे कदमों पर विचार कर रहे थे। ऑस्ट्रेलिया के 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने के बाद स्थिति बदली। बयान के अनुसार, चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में भी ऐसे नियम लागू किए गए हैं। कुछ देशों की संसदों में इसी तरह के प्रस्ताव लंबित हैं और कई अन्य देशों में इन पर चर्चा चल रही है। पैरेंट्स की सहमति पर भी बात रखी रिपोर्ट में चुने गए देशों के अनुबंध संबंधी कानूनी प्रावधानों और माता-पिता की सहमति का भी विश्लेषण किया गया। इसमें कहा गया है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ बाध्यकारी अनुबंध करने की न्यूनतम उम्र अलग-अलग देशों में अलग है। अमेरिका के फ्लोरिडा में यह उम्र 14 साल और ओहायो में 16 साल है। वियतनाम में भी इसी तरह की उम्र सीमा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में यह सीमा 18 साल है। इसका मतलब है कि नाबालिग द्वारा किया गया समझौता शुरू से ही अमान्य माना जाता है। रिपोर्ट का पांच कॉलम वाला स्ट्रक्चर