घोर गरीबी में जी रहा ये घुमंतू समुदाय किसी आरक्षित सूची में अधिसूचित नहीं, अर्ध घुमंतू सूची में ये जंगलूस मध्य राजस्थान के नागौर, अजमेर से लेकर पश्चिमी राजस्थान के पाली-जोधपुर तक अनेक जिलों के विभिन्न गांवों में बसे जंगलिया समुदाय के लोग आज भी घोर गरीबी और पिछड़ेपन में जिंदगी गुजार रहे हैं। जंगलों में रहने के कारण ही इनका नाम जंगलिया पड़ा। ये गांवों के बाहर डेरा डालकर रहते हैं। ये भूमिहीन हैं, दूसरों के खेतों की रखवाली करते हैं। पशुपालन और मजदूरी ही इनकी आजीविका है। इनकी मुश्किल सिर्फ गरीबी नहीं है ‘जंगलिया’ नाम राजस्थान की अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की किसी आरक्षित सूची में अधिसूचित नहीं है। इसलिए ये सामान्य वर्ग में आते हैं और इनका आरक्षित जाति प्रमाणपत्र नहीं बनता। नतीजा- पिछड़े परिवारों के बच्चों को शिक्षा व सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग के साथ खड़े होकर प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और इससे उनकी नई पीढ़ी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। जंगलिया समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार इनकी आबादी प्रदेश में करीब 25 हजार है। असली पेच : ‘जंगलिया’ आरक्षित सूची में नहीं, ‘जंगलूस’ अर्द्धघुमंतू सूची में घुमंतू-अर्द्धघुमंतू-विमुक्त जाति परिषद राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष रतन नाथ बताते हैं सरकारी रिकॉर्ड में इस समुदाय के लोगों को कभी ‘जंगलूस’, ‘चौकीदार’ तो कभी ‘बावरी’ दर्ज कर दिया गया। विमुक्त, घुमंतू और अर्द्धघुमंतू समुदायों की पुरानी सरकारी सूची में ‘जंगलूस’ अर्द्धघुमंतू श्रेणी में दर्ज है, जबकि ‘जंगलिया’ नाम नहीं है। समुदाय के प्रतिनिधि जंगलूस और जंगलिया को एक ही बताते हैं। नाम के इसी अंतर के कारण जंगलिया परिवारों को सूचीबद्ध अर्द्धघुमंतू पहचान का लाभ नहीं मिलने की शिकायत है। हालांकि अर्द्धघुमंतू सूची में नाम होने भर से आरक्षण नहीं मिलता। अर्द्धघुमंतू सूची में नाम होना अलग पहचान देता है, एससी, एसटी या ओबीसी आरक्षण के लिए जाति का संबंधित आरक्षित सूची में शामिल होना जरूरी है। राज्य सरकार ने 2021 में सूचीबद्ध विमुक्त, घुमंतू और अर्द्धघुमंतू जातियों के लिए अलग पहचान प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की थी। गौरतलब है कि केवल जंगलिया ही नहीं, पुराने रिकॉर्ड में जंगलूस सहित 20 से ज्यादा समुदाय/उपसमूह एससी, एसटी और ओबीसी से बाहर दर्ज थे। हालांकि बाद में इनमें से कुछ समुदायों का वर्गीकरण बदला है। पूर्व मंत्री गोपाल केसावत इस समस्या को जंगलिया से आगे घुमंतू-अर्द्धघुमंतू समुदायों के पुराने वर्गीकरण से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि मूल सूची 1964 की है और छह दशक में कई समुदायों के प्रचलित नाम, सामाजिक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड के बीच विसंगतियां बनी हुई हैं। उन्होंने सरकार से विशेषज्ञों, अधिकारियों और घुमंतू समुदायों के जानकारों की उच्चस्तरीय समिति बनाकर पुरानी सूची की समीक्षा कराने की मांग की है। जंगलिया समाज राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष उगमाराम जंगलिया कहते हैं, कई बार ज्ञापन देने के बावजूद इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है। हमें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाना चाहिए। समुदाय के पास जातिगत पहचान साबित करने वाले पुराने दस्तावेज नहीं होने से प्रमाणपत्र बनवाने में परेशानी आती है। अधिकांश परिवार भूमिहीन हैं, इसलिए उनके पास पुराने भूमि रिकॉर्ड भी नहीं हैं। दस्तावेजों की कमी से प्रशासनिक स्तर पर भी समस्या आती है। हमारा प्रयास है कि जल्द नीतिगत स्तर पर इसका समाधान निकाला जाए।- लक्ष्मणराम कालरू, विधायक, मेड़ता 75% अंक लाने के बावजूद मजदूरी का ही विकल्प सबसे बड़ी कीमत नई पीढ़ी चुका रही है। कानाराम ने 12वीं में 75% अंक पाए हैं, फिर भी उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच सके। अब उनके पास मजदूरी का ही विकल्प है। नागौर के बेदावड़ी गांव के 60 वर्षीय जंगलिया नेता, जीवनलाल जंगलिया बताते हैं कि युवावस्था में वे खुद को एससी समझ पुलिस भर्ती में शामिल हुए थे। परीक्षा में सफल हुए पर आरक्षित श्रेणी साबित करने वाला दस्तावेज नहीं था। नौकरी का सपना टूट गया। इनके लिए केंद्र का कमीशन काम करता है। ओबीसी में राज्य के पास प्रावधान होता है। हम इन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहे हैं।- अविनाश गहलोत, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री आखिर जंगलिया सूची से बाहर क्यों?... नागौर के सामाजिक-राजनीतिक एक्टिविस्ट अशोक चौधरी इसे लंबे समय की प्रशासनिक उपेक्षा मानते हैं। वे कहते हैं, इस समुदाय की तरफ सूचीकरण के समय पर्याप्त ध्यान नहीं गया। दूसरी ओर समुदाय इतना गरीब, पिछड़ा और असंगठित था कि अपनी मांग को प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ा सका। उन्होंने जंगलिया समुदाय का अलग सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराने की मांग की है। इसके आधार पर समुदाय के पिछड़ेपन का दस्तावेज तैयार हो और प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।