14 साल तक मार्केटिंग कंपनी में जॉब की। फिर प्राइवेट जॉब छोड़कर खीरे और महोगनी (ग्रीन गोल्ड) की खेती शुरू की। तीन साल में ही उसकी सालाना कमाई 10 लाख तक पहुंच गई है। खैरथल-तिजारा के किशनगढ़बास के रहने वाले साकिर खान (33) ने बताया कि खेती का आइडिया एक गांव में लगे 250 से ज्यादा पॉलीहाउस देखकर आया। खेती शुरू करने से पहले खाद-बीज का बिजनेस भी किया। बिजनेस सेट हो जाने के बाद उन्होंने पूरा ध्यान खेती पर दिया। इसके रिजल्ट अब दिखने लगे हैं। उनके खीरे की डिमांड आसपास के कई जिलों में हैं। म्हारे देश की खेती में इस बार बात खैरथल-तिजारा के किसान की … साकिर ने बताया कि उनके पिता हनीफ खान (65) भी किसान हैं। परिवार के पास करीब 14 बीघा जमीन है। पहले परिवार पारंपरिक तरीके से खेती करता था, लेकिन बाद में खेती के साथ कुछ अलग करने का विचार आया। ग्रेजुएशन के बाद अलवर में एक कंपनी के लिए फर्टिलाइजर की सेल्स और मार्केटिंग का काम किया। करीब 40 हजार रुपए महीने मिलते थे। इस दौरान लगा नौकरी में इतनी मेहनत होती है, अगर खुद के लिए प्रयास करें तो बिजनेस सेट हो सकता है। इस दौरान खाद-बीज का काम शुरू किया और किशनगढ़बास में रिटेलर शॉप खोल ली। इसके बाद 2023 में उन्होंने कंपनी की नौकरी छोड़ दी और खेती व खाद-बीज के कारोबार पर ध्यान देने लगे। जयपुर के बसेड़ी में पॉलीहाउस देखकर आया खेती का आइडिया साल 2021 में वह जयपुर के बसेड़ी में गांव में नौकरी के दौरान फर्टिलाइजर की सेल और मार्केटिंग के लिए विजिट पर गए थे। वहां देखा कि गांव में 250 से ज्यादा पॉलीहाउस लगे हुए थे। यहीं से उन्हें पॉलीहाउस लगाने की इंस्पिरेशन मिली। इसी दौरान उनका संपर्क पड़ोस में माचा गांव के किसान भुवनेश मेघवाल से हुआ। साकिर वहां फर्टिलाइजर देते थे और भुवनेश के फार्म पर विजिट भी करते थे। भुवनेश ने 2018 में पॉलीहाउस लगाया था। 2024 में पॉलीहाउस लगाने की इच्छा जाहिर की तो भुवनेश ने ही उन्हें सेकेंड हैंड पॉलीहाउस दिलाया। इसकी कीमत करीब 10.50 लाख रुपए थी। उन्हीं से पॉलीहाउस में खेती करने का तरीका सीखा। 3 हजार वर्गमीटर में खीरा लगाया, 35 दिन में पहली तुड़ाई साकिर ने बताया - अप्रैल 2024 में पॉलीहाउस खरीदा था और 2 अगस्त को पहली क्रॉप के तौर पर खीरा लगाया। पॉलीहाउस में पहली फसल लगाने तक करीब 21 लाख रुपए खर्च हुए। 3 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में करीब 8 हजार खीरे के बीज लगाए। करीब 1000 बीजों की कीमत 5,500 रुपए आई। साकिर के अनुसार, 2 अगस्त को खीरा लगाने के करीब 25 दिन बाद फूल आना शुरू हो गए थे और करीब 35 दिन बाद पहली तुड़ाई हो गई। पहली तुड़ाई में करीब 700 किलो खीरा निकला। एक फसल करीब 4 महीने चलती है। पहली तुड़ाई के बाद एक दिन छोड़कर एक दिन खीरे की तुड़ाई की जाती है। फसल के आखिरी दौर में करीब 2 क्विंटल तक खीरा निकलता है। बाजार में खीरे का भाव 40 रुपए किलो तक रहा है, जबकि अभी करीब 25 रुपए किलो तक भाव मिल रहा है। साकिर ने बताया कि साल में दो बार खीरे की फसल ली जा सकती है। दोनों क्रॉप से करीब 10 लाख रुपए सालाना कमाई हो जाती है। पॉलीहाउस में काम के लिए उन्होंने पांच लोगों को रोजगार भी दे रखा है। इन कर्मचारियों सहित पॉलीहाउस में हर महीने करीब 80 हजार रुपए का खर्च आता है। पॉलीहाउस के बाद मोहगनी की खेती का आइडिया मिला साकिर ने बताया - एक दिन वह पॉलीहाउस के सामने बैठे थे। इसी दौरान यूपी की एक कंपनी का कर्मचारी विजिट पर आया। उसने मोहगनी के पौधों और इसकी खेती के फायदे के बारे में बताया। कर्मचारी ने समझाया कि मोहगनी की खेती फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह है। आज पौधे लगाओगे तो 10 से 12 साल में अच्छा रिटर्न मिल सकता है। मोहगनी के पौधों की सर्वाइवल रेट 100 प्रतिशत रहती है और यह सभी तरह की मिट्टी में पनप सकता है। इसमें ज्यादा खर्च भी नहीं होता। इसके बाद साकिर ने आधा एकड़ जमीन में 700 मोहगनी के पौधे लगाए। एक पौधा 169 रुपए का पड़ा। मई 2025 में उन्होंने करीब एक फीट ऊंचाई के पौधे लगाए थे, जो अब करीब 7 से 8 फीट तक हो गए हैं। जिस जमीन में पौधे लगाए हैं, वहां लाल मिट्टी है और मीठा पानी है। मोहगनी के साथ दूसरी फसलें भी लगा रहे, दुकान का काम भी संभालते हैं साकिर ने बताया - मोहगनी के पौधे लगाने की शुरुआत में गोबर की खाद और DAP दिया था। दीमक से बचाव के लिए फिप्रोनिल का इस्तेमाल किया। एक एकड़ के लिए करीब एक किलो दवा 40 किलो खाद में मिलाकर 700 पौधों के लिए इस्तेमाल की गई थी। उनके अनुसार मोहगनी के पौधे बारिश के मौसम में लगाने चाहिए। पिछले बार मोहगनी के बीच पालक की फसल लगाई थी, जिससे करीब 80 हजार रुपए की कमाई हुई थी। अभी खेत में गेंदे के पौधे भी लगा रखे हैं। … खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए... राजस्थान में किसान बकरी के दूध से बना रहा साबुन:सालाना 8 लाख की कमाई; जमीन गिरवी रख लोन लिया, पशुपालन को बनाया बिजनेस मॉडल खुद ज्यादा पढ़ नहीं पाए तो स्कूल-कॉलेज खोलकर शिक्षा से जुड़ने का प्रयास किया, लेकिन कोरोना काल में इन्हें बंद करना पड़ा। पूरी खबर पढ़िए