नेपाल में बाढ़ के बाद हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरंगों में फंसे कर्मचारियों को बचाने के लिए भारत ने भी अपनी फोरेंसिक और टनल रेस्क्यू टीमें तैनात कर दी हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत की 19 सदस्यीय फोरेंसिक टीम ने काठमांडू में काम शुरू कर दिया है। यह टीम बाढ़ पीड़ितों के शवों की पहचान के लिए DNA सैंपल की जांच में मदद करेगी। वहीं, भारतीय टनल रेस्क्यू टीम ने चिलिमे और लांगटांग के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में नेपाल सेना के सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन में मदद की। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 898 कर्मचारी अब भी फंसे हैं। 26 अगस्त को नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशुली नदी में अचानक बाढ़ आ गई थी। इस आपदा में नेपाल में अब तक 788 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, तिब्बत में मरने वालों का आंकड़ा 16 पहुंच गया है। बाढ़ के बाद तबाही का मंजर, 4 तस्वीरें… खबर में आगे नेपाल त्रासदी से जुड़े पल-पल के अपडेट्स, लेकिन उससे पहले पढ़िए भास्कर नॉलेज… सुरंग में फंसे लोग कितनी देर जिंदा रह सकते हैं? इसकी कोई तय समय-सीमा नहीं होती। यह सुरंग के आकार, अंदर मौजूद हवा, लोगों की संख्या, ऑक्सीजन-CO₂ के स्तर, पानी, तापमान और लोगों की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। अंदर फंसे लोगों को क्या खतरा हो सकता है 4 पॉइंट्स में पढ़ें… 1. ऑक्सीजन कम होना सबसे पहला खतरा सामान्य हवा में करीब 20.9% ऑक्सीजन होती है। 19.5% से कम ऑक्सीजन को खतरनाक माना जाता है। बंद सुरंग में लोग सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन घटती और CO₂ बढ़ती है। 2. मलबा भी बड़ा खतरा बाढ़ का पानी और कीचड़ सुरंग में भरने से सुरक्षित जगह कम हो सकती है। वहीं मलबा रास्ता बंद कर सकता है और सुरंग की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। 3. ठंड और पानी का खतरा अगर सुरंग में बाढ़ का पानी भर रहा है और कर्मचारी लंबे समय तक गीले और ठंडे माहौल में फंसे हैं, तो हाइपोथर्मिया यानी शरीर का तापमान खतरनाक रूप से गिरने का जोखिम बढ़ सकता है। 4. पाइप 6 इंच का क्यों जरूरी? पाइप से सुरंग के अंदर ताजी हवा पहुंचाई जा सकती है, जिससे सांस लेने लायक वातावरण बनाए रखने में मदद मिलती है। लेकिन सिर्फ हवा पहुंचाना पर्याप्त नहीं है; अंदर ऑक्सीजन और CO₂ के स्तर की निगरानी भी जरूरी है। खबर से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे दिए ब्लॉग से गुजर जाइए…