1994 से अब तक 6 बोर्ड बने, 12 चेहरे मेयर रहे, एक ही बोर्ड में तीन बार बदला महापौर का चेहरा, 2026 में फिर सामान्य सीट नरेश वशिष्ठ | जयपुर निगम के 32 साल के राजनीतिक इतिहास में मेयर की कुर्सी सिर्फ शहरी सरकार चलाने का पद नहीं रही, बल्कि यह सत्ता के समीकरण, जातीय प्रतिनिधित्व और नेताओं की राजनीतिक हैसियत का केंद्र भी रही है। 1994 में नगर निगम का पहला बोर्ड बनने के बाद अब तक छह चुनावी बोर्ड बने हैं। इस दौरान 13 ने मेयर पद संभाला, लेकिन अलग-अलग चेहरे 12 रहे, क्योंकि शील धाभाई दो अलग-अलग मौकों पर मेयर बनीं। इन 32 साल में मेयर की कुर्सी पर भाजपा का सबसे ज्यादा दबदबा रहा। सामाजिक समीकरण देखें तो वैश्य और गुर्जर समाज के चार-चार, ब्राह्मण समाज के दो तथा पंजाबी, यादव और एससी समाज से एक-एक मेयर रहे। 2020 में जयपुर को ग्रेटर और हेरिटेज दो निगमों में बांटने के बाद एक साथ दो मेयर बने। मोहनलाल से शुरुआत, ज्योति खंडेलवाल पहली बार सीधे चुनी गईं मेयर; 2020 में 2 निगम-2 महापौर धाभाई दो बार मेयर बनीं 1994 से 2025 तक जयपुर में मेयर पद संभालने वाले अलग-अलग चेहरे 12 हैं, लेकिन मेयर पद की जिम्मेदारी 13 बार बदली। शील धाभाई दो बार कार्यवाहक मेयर बनीं। 1999 में मेयर निर्मला वर्मा के निधन के बाद और 2020 में ग्रेटर निगम की मेयर सौम्या गुर्जर के निलंबन के बाद शील धाभाई ने पद संभाला था। जयपुर नगर निगम: महापौरों का सामाजिक/जातीय प्रतिनिधित्व वैश्य समाज: 4 बार गुर्जर समाज: 4 बार ब्राह्मण समाज: 2 बार पंजाबी समाज: 1 बार यादव समाज: 1 बार अनुसूचित जाति (SC): 1 बार पार्टियों का हिसाब-किताब भाजपा; मेयर की कुर्सी पर भाजपा का दबदबा सबसे ज्यादा रहा है। मोहनलाल गुप्ता से लेकर निर्मला वर्मा, शील धाभाई, अशोक परनामी, पंकज जोशी, निर्मल नाहटा, अशोक लाहोटी और सौम्या गुर्जर तक भाजपा से जुड़े चेहरे इस पद पर रहे। कांग्रेस; ज्योति खंडेलवाल और मुनेश गुर्जर मेयर बनीं। वहीं विष्णु लाटा भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव जीते और कांग्रेस के समर्थन से मेयर बने। 2019 में उन्होंने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को एक वोट से हराया था। कुसुम यादव भाजपा से बगावत कर निर्दलीय पार्षद बनी थीं और 2024 में मुनेश गुर्जर के निलंबन के बाद हेरिटेज की कार्यवाहक मेयर बनीं। वे उस समय निर्दलीय पार्षद थीं, हालांकि उन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त था।