बेहतर उत्पादन की उम्मीद में किसान नए-नए बीज और पौधों की वैरायटी की तलाश में रहते हैं। खराब बीज और पौधों से न केवल किसानों की उम्मीदें टूटती हैं, बल्कि नुकसान भी होता है। ऐसे समय में सवाल उठता है कि जब नर्सरियां और रिसर्च सेंटर नहीं थे, तब किसान अच्छी पैदावार कैसे लेते थे? दरअसल, किसान अपनी अगली फसल के लिए खुद ही बीज तैयार करते थे। यही परंपरा आज भी बताती है कि अपनी फसल से तैयार बीज भरोसेमंद और टिकाऊ होता है। अरावली की पहाड़ियों में वर्षों पहले बागवानी का ऐसा ही कल्चर डेवलप हुआ। गुठली (बीज) से तैयार आम के बगीचे ही लोगों के जीवन का आधार हैं। किसान पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। पुराने बगीचों से मिलने वाली गुठलियों से नए पौधे बना रहे हैं और बगीचों का विस्तार कर रहे हैं। इसलिए सदियों पुराना कैरी का स्वाद आज भी बरकरार है। चार बीघा के एक बगीचे से तैयार कैरी के अचार से किसान को सालाना करीब आठ लाख रुपए से ज्यादा की कमाई हो रही है। इस अचार की डिमांड विदेशों में भी है। म्हारे देश की खेती में आज बात झुंझुनूं के किसान की… झुंझुनूं जिले में नवलगढ़ के लोहार्गल निवासी किसान दशरथ सिंह शेखावत (55) के पास चार बीघा में आम का बगीचा है। बगीचे में करीब 130 पेड़ हैं। इनमें करीब 30 पेड़ 100 साल पुराने हैं, वहीं करीब 70 पेड़ 50 साल पुराने हैं। पहले वे कैरी (कच्चा आम) मंडी में बेचते थे, लेकिन अच्छा दाम नहीं मिलने पर उन्होंने कैरी का अचार बनाना शुरू कर दिया। पिछले सात साल से उनके बड़े बेटे शिवराज सिंह शेखावत (22) इस कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं, छोटा बेटा हंसराज (18) ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा है। जनवरी में आते हैं फूल दशरथ सिंह बताते हैं- आम के पेड़ों पर जनवरी में फूल आना शुरू हो जाते हैं। इसके बाद मार्च में कैरी तैयार होने लगती है। मई, जून और जुलाई, तीन महीने कैरी का सीजन रहता है। मई में कैरी पूरी तरह से पक कर तैयार हो जाती है। जून की शुरुआत में बगीचों में आम के पेड़ों पर लगी कैरी को पकने से पहले अचार डालने के लिए तोड़ना शुरू कर दिया जाता है। पेड़ से कैरी को तोड़ने के बाद उनकी कटिंग की जाती है। कैरी तोड़ने, उसकी कटिंग, मिक्सिंग से लेकर पैकिंग करने का परिवार के लोग मिलकर करते हैं। एक पेड़ से दो क्विंटल कैरी एक पेड़ से औसतन करीब दो क्विंटल कैरी मिल जाती है। मंडी में कैरी का भाव करीब 100 रुपए प्रति किलो मिलता है, जबकि उसी कैरी का अचार बनाकर करीब 200 रुपए प्रति किलो में बेचा जाता है। इससे आमदनी भी दोगुनी हो जाती है। अब तीन बीघा में तैयार कर रहे नया बगीचा किसान ने बताया- पहले आम के बगीचे के बीच में गेहूं जैसी दूसरी फसल भी उगा लेते थे, लेकिन जैसे-जैसे पेड़ बड़े हुए, उनके नीचे दूसरी फसल होना बंद हो गई। अब उन्होंने तीन बीघा जमीन पर आम का नया बगीचा तैयार करना शुरू किया है। इसमें गुठली से तैयार करीब 60 पौधे लगाए गए हैं। सभी पौधों के बीच 20×20 फीट की दूरी रखी गई है, ताकि पेड़ों को पर्याप्त जगह मिल सके। लोहार्गल की कैरी का स्वाद ही इसकी पहचान शिवराज सिंह शेखावत बताते हैं कि गुठली से तैयार होने वाले लोहार्गल के आम के पौधे इस क्षेत्र के बाहर आसानी से नहीं पनपते। यहां की कैरी में मिलने वाले रेशे, उसका खट्टा-मीठा और चटपटा स्वाद इसे अलग पहचान देते हैं। लोहार्गल में जो अचार की क्वालिटी मिलती है, वो पूरे राजस्थान में कहीं भी नहीं है। यही वजह है कि एक बार यहां का अचार खाने वाले लोग दोबारा खरीदने के लिए लोहार्गल जरूर आते हैं। स्वाद ने अचार को बनाया ब्रांड शिवराज सिंह शेखावत बताते हैं- बेहतरीन स्वाद ने कुछ ही सालों में लोहार्गल के अचार को ब्रांड बना दिया। धीरे-धीरे कई परिवारों ने इसे घर से ही बनाकर बेचना शुरू कर दिया। साल 1990 आते-आते जब बाजार पर मार्केटिंग कंपनियों की नजर पड़ी तो पैकिंग में बिकने लगा। आज कम से कम 10 से 12 कंपनियां रजिस्टर्ड ब्रांड से लोहार्गल का अचार बेच रही हैं। वहीं 300 से ज्यादा लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। नेचुरल तरीके से तैयार होती है कैरी कैरी के छिलके थोड़े मोटे होते हैं, जो स्वाद को और भी बेहतर बनाते हैं। इस कैरी में कोई केमिकल नहीं होता, ऑर्गेनिक तरीके से पकती है। नेचुरल खट्टापन होने के कारण इसमें सिरका नहीं मिलाना पड़ता है। सबसे खास बात ये है कि मसालों और सरसों के तेल का स्वाद कैरी के अंदर तक जालों में समा जाता है। जालेदार होने के कारण हर पीस में एक जैसा स्वाद बनता है। जैसे ही डिब्बे का ढक्कन खुलता है, अचार की खुशबू फैल जाती है। तीर्थयात्री लेकर जाते हैं अचार लोहार्गल तीर्थ स्थल पर राजस्थान ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं। शिवराज बताते हैं कि यहां आने वाले कई लोग कम से कम पांच किलो अचार अपने साथ लेकर जाते हैं। कई ग्राहक तो सिर्फ अचार खरीदने के लिए ही आते हैं। फोन पर भी ऑर्डर मिलते हैं और जहां तक संभव होता है, वहां तक अचार की डिलीवरी भी की जाती है। शेखावाटी क्षेत्र सहित जयपुर, हनुमानगढ़, बीकानेर, सीकर, गुरुग्राम, कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हरियाणा, मध्य प्रदेश, सूरत सहित कई जगह अचार की डिमांड रहती है। वहीं शेखावाटी से खाड़ी देशों में रहने वाले लोग भी अपने साथ यह अचार जरूर लेकर जाते हैं। इनपुट सहयोग : राजकुमार शर्मा, नवलगढ़ (झुंझुनूं) … खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए... बागवानी के लिए बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ी:अब फलों से हर साल 10 लाख की कमाई, नवाचार के लिए सरकार करेगी सम्मानित खेती के लिए बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ दी। दिल्ली से गांव लौटकर 10 बीघा में बागवानी करने की शुरुआत की। खेत में अलग-अलग वैरायटी के पौधों से ट्रायल किया। पूरी खबर पढ़िए