जयसमंद सेंचुरी पर हुए एक रिसर्च में साफ हुआ है कि यहां पर लेपर्ड के हमले से ज्यादातर पशुधन को नुकसान पहुंचा है, लेकिन प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजे की राशि जितनी मिलती है, वो उनको होने वाले नुकसान से कम होती है। यहीं नहीं जितनी घटनाएं लेपर्ड के हमले से जुड़ी हुई हैं, उसमें 31 प्रतिशत लोग ही हैं, जिन्होंने मुआवजे के लिए आवेदन किया था, बाकी इसके लिए लोगों में जानकारी ही नहीं है। राजस्थान के दक्षिणी अरावली क्षेत्र से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो इंसान और वन्यजीवों के रिश्ते को नए नजरिए से दिखाती है। जहां एक ओर तेंदुए के हमलों से ग्रामीणों को लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इन हमलों के बावजूद लोगों में न तो गुस्सा है और न ही बदले की भावना। जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य के आसपास हुए एक लंबे अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि संघर्ष के बीच भी सह-अस्तित्व संभव है-और यही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है। उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया के प्राणी शास्त्र विभाग के प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार कोली और उनके दल के सदस्य कमल वैष्णव, निर्भय सिंह चौहान और उत्कर्ष प्रजापति ने एक रिसर्च किया। इसमें साल 2011 से 2024 के बीच किए अध्ययन में 572 मानव-तेंदुआ संघर्ष घटनाएं दर्ज की गई, जिनमें से लगभग 98% मामले पशुधन के शिकार से जुड़े थे। रात में सबसे ज्यादा खतरा, बकरियां निशाने पर डॉ. कोली ने बताया कि शोध में सामने आया कि तेंदुए के हमले मुख्य रूप से रात के समय होते हैं, जब पशु खुले या कच्चे बाड़ों में बंधे होते हैं। इनमें बकरियां, गाय और बछड़े सबसे ज्यादा शिकार बने। शोध में पाया गया है कि ऊंचाई वाले और अभयारण्य के पास स्थित गांवों में खतरा सबसे अधिक पाया गया, जहां मानव बस्तियां और वन क्षेत्र एक-दूसरे से सटे हुए हैं। सबसे ज्यादा निशाने पर बकरियां रहती हैं। मुआवजे के लिए तो आवेदन ही नहीं करते कोली ने बताया कि अध्ययन में मुआवजा प्रणाली की बड़ी खामियां भी उजागर हुईं। कुल घटनाओं में से केवल 31% मामलों में ही मुआवजे के लिए दावा किया गया। इसी प्रकार स्वीकृत राशि वास्तविक नुकसान से काफी कम रही वहीं जटिल कागजी प्रक्रिया और कम जागरूकता प्रमुख बाधाएं रहीं। इससे ग्रामीणों में आर्थिक दबाव तो बढ़ा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इससे तेंदुए के प्रति हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दिखी। बदले की भावना नहीं शोध में सामने आया कि इस सेंचुरी में लेपर्ड के खिलाफ बदले में हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया। स्थानीय लोगों का दृष्टिकोण बताता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं वन्यजीव संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही हैं। आसपास के शिक्षित लोग लेपर्ड के प्रति अधिक सकारात्मक सोच रखते हैं जबकि कम आय और कम शिक्षा वाले परिवारों में डर और नकारात्मकता ज्यादा है। लेपर्ड से संघर्ष के कई कारण विशेषज्ञों के अनुसार इस सेंचुरी में लेपर्ड संघर्ष के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इसके तहत जंगल और गांवों के बीच बढ़ती नजदीकी, खुले और असुरक्षित पशु बाड़े, भूमि उपयोग में बदलाव, अभयारण्य के आसपास मानव गतिविधियां आदि लेपर्ड और मानव संर्घ के प्रमुख कारण पाए गए हैं। लोगों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो एनटीसीए के सदस्य और वाईल्ड लाइफ विंग से रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक राहुल भटनागर के अनुसार यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि लेपर्ड को बचाने के लिए केवल जंगल संरक्षण पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि उन लोगों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जो इन वन्यजीवों के साथ अपनी जमीन साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरावली की पहाड़ियों में यह सह अस्तित्व की कहानी न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती हैं, जहां संघर्ष के बीच भी संतुलन संभव है।