देश की बड़ी यूनिवर्सिटीज और रिसर्च संस्थानों में पीएचडी थीसिस और रिसर्च पेपर जमा करने का दौर चल रहा है। इसी के साथ साहित्य चोरी यानी प्लेजरिज्म को छुपाने और एंटी-प्लेजरिज्म सॉफ्टवेयर को चकमा देने के लिए छात्र नए-नए तकनीकी और एआई को भी अपना रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक सॉफ्टवेयर इन चालाकियों को काफी हद तक पकड़ लेते हैं। लेकिन, भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि कई छात्र दूसरे के काम को कॉपी करने के बाद सॉफ्टवेयर की पकड़ से बचने के लिए टेक्स्ट में तकनीकी बदलाव करते हैं। समस्या यह है कि कई विश्वविद्यालयों में अब भी अपडेटेड सॉफ्टवेयर और नए तरह के प्लेजरिज्म को पकड़ने वाले टूल्स की कमी है। कई गाइड भी इन तकनीकों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। डॉ. विजय गुप्ता, वरिष्ठ प्रोफेसर व प्राचार्य, आरएनटी मेडिकल कॉलेज, उदयपुर के अनुसार क्लीनिकल विषयों में थीसिस की नकल आसान नहीं है, लेकिन इसके लिए गाइड की सतर्कता जरूरी है। रेफरेंस संबंधित अध्ययन से मेल खाना चाहिए और उसका प्रमाण पबमेड जैसी मान्य वेबसाइट पर उपलब्ध होना चाहिए। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अपडेटेड सॉफ्टवेयर रखने होंगे। प्लेजरिज्म छुपाने के लिए ये हैं मुख्य तरीके प्लेजरिज्म जांच के लिए कई टूल्स उपलब्ध, टर्निटिन सबसे विश्वसनीय अकादमिक विशेषज्ञों के अनुसार प्लेजरिज्म जांच के लिए कई स्तर के टूल्स उपलब्ध हैं। विश्वविद्यालयों में टर्निटिन सबसे विश्वसनीय माना जाता है, जबकि यूरकुंड सहित अन्य टूल्स का उपयोग भी यूजीसी के माध्यम से किया जाता है। छात्रों के लिए स्क्रिबिर, पेपरपैल और क्यूटेक्स जैसे सेल्फ-चेक विकल्प हैं। एआई आधारित सामग्री की पहचान के लिए जीपीटी जीरो, प्रूफेडेमिक और कॉपीलीक्स उपयोगी हैं। ग्रामरली प्रो भी प्लेजरिज्म जांचता है, जबकि डुप्लीचेकर और स्मॉल एसईओ टूल्स सीमित डेटाबेस के कारण शोध कार्यों के लिए पर्याप्त नहीं माने जाते। सॉफ्टवेयर में थीसिस डालते ही लाल रंग खोल देता है पोल डॉ. जोरावर सिंह राणावत, वरिष्ठ शिक्षाविद के अनुसार तकनीक लगातार बदल रही है और आधुनिक सॉफ्टवेयर अब ऐसे तरीकों को भी पकड़ने में सक्षम हैं। प्लेजरिज्म सॉफ्टवेयर थीसिस को अपने डेटाबेस में मौजूद सामग्री से मिलाता है। जहां समानता मिलती है, वहां संबंधित टेक्स्ट को लाल रंग में मार्क कर दिया जाता है। कई बार सॉफ्टवेयर मूल स्रोत स्पष्ट नहीं कर पाता, लेकिन समानता पकड़ लेता है।