झुंझुनूं के बीडीके जिला अस्पताल में दवा बांटने के दौरान नियमों की अनदेखी हो रही है। दवा काउंटर पर कई फार्मासिस्ट बिना सफेद कोट, नेम प्लेट और किसी भी पहचान के मरीजों को दवा दे रहे हैं। जबकि फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के नियमों के मुताबिक हर फार्मासिस्ट के लिए सफेद एप्रन पहनना और नाम, पद और रजिस्ट्रेशन नंबर वाली नेम प्लेट लगाना जरूरी है, ताकि मरीज को पता रहे कि उसे दवा कौन दे रहा है और गलती होने पर जिम्मेदारी तय की जा सके। बिना पहचान के हो रहा दवा वितरण बीडीके अस्पताल के दवा काउंटर पर हर दिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, लेकिन दवा देने वाले कर्मचारियों की पहचान स्पष्ट नहीं होती। फार्मासिस्ट सामान्य कपड़ों में ड्यूटी करते नजर आते हैं। यह स्थिति फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन के विपरीत बताई जा रही है और मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय मानी जा रही है। गलती होने पर जवाबदेही तय करना मुश्किल यदि कोई मरीज दवा या उसकी जानकारी को लेकर सवाल पूछता है, तो कई बार विवाद की स्थिति बन जाती है। वहीं, यदि दवा वितरण में कोई गलती हो जाए या गलत दवा दे दी जाए, तो बिना नाम और पदनाम के जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में शिकायत और जवाबदेही तय करना भी आसान नहीं रहता। डॉक्टर और नर्स ड्रेस कोड में, फार्मासिस्टों पर सवाल अस्पताल में डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और लैब टेक्नीशियन तय ड्रेस कोड और नेम प्लेट के साथ ड्यूटी करते हैं, लेकिन दवा काउंटर पर तैनात फार्मासिस्टों के मामले में ऐसा नहीं दिखता। इससे अस्पताल में नियमों के पालन को लेकर दोहरे मापदंड होने के सवाल उठ रहे हैं। पड़ोसी राज्यों में यूनिफॉर्म अनिवार्य हरियाणा और पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों में फार्मासिस्टों के लिए यूनिफॉर्म पहनना अनिवार्य है, जिससे मरीज आसानी से उनकी पहचान कर सकें और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बनी रहे। इसके उलट झुंझुनूं के बीडीके अस्पताल में इन मानकों का पालन नहीं होने की बात सामने आई है। PCI के नियम क्या कहते हैं फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के अनुसार, फार्मासिस्ट के लिए सफेद कोट या एप्रन पहनना अनिवार्य है। साथ ही सीने पर नेम प्लेट, पदनाम और आधिकारिक रजिस्ट्रेशन नंबर होना भी जरूरी है, ताकि मरीज यह पहचान सके कि वह किसी रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट से दवा ले रहा है। दवा काउंटर पहले भी रहा विवादों में बीडीके अस्पताल का दवा काउंटर पहले भी विवादों में रह चुका है। कुछ समय पहले रात के समय गलत दवा देने और मरीजों के साथ बदसलूकी जैसी शिकायतें सामने आई थीं। इन घटनाओं के बावजूद व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं होने से मरीजों की सुरक्षा और अस्पताल की कार्यप्रणाली पर फिर सवाल खड़े हो रहे हैं।