उदयपुर नगर निगम के इतिहास में कभी क्रॉस वोटिंग न हुई हो, लेकिन इस बार शहर महामंत्री पारस सिंघवी को मेयर प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा को अपने ही कुनबे में बड़े भितरघात का डर सताने लगा है। अगर मेयर पद के लिए क्रॉस वोटिंग हुई तो ऐसा उदयपुर निगम के इतिहास में पहली बार होगा। भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ प्रदेशाध्यक्ष नेता प्रमोद सामर, पूर्व शहर जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट, पंजाब राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के रिश्तेदार व पूर्व शहर जिला उपाध्यक्ष अतुल चंडालिया, आकाश वागरेचा जैसे दिग्गजों को साइडलाइन किए जाने से उपजे असंतोष के बीच बाड़ेबंदी में सन्नाटा है। सूत्रों के मुताबिक बाड़ेबंदी में दिग्गज पार्षद खपा होकर अपने-अपने खेमे के पार्षदों से ही बातचीत कर रहे हैं। इनके समर्थक भी आक्रोशित हैं। भाजपा के कुछ दिग्गज नेताओं ने प्रदेश भाजपा-चुनावी प्रबंधन से जुड़े दो भाजपा नेताओं की दिल्ली तक शिकायत कर दी है, जिन्हें 21 सितंबर को मेयर प्रत्याशियों के मतदान से दूर रखने की मांग की है। ऐसे में भाजपा पदाधिकारियों को क्रॉस वोटिंग की सुगबुगाहट बेचैन कर रही है। मेयर पद के प्रबल उम्मीदवार रहे 69 वर्षीय पार्षद भट्ट की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां ह्रदय रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम उनका इलाज कर रही है। बता दें कि कांग्रेस से मेयर प्रत्याशी पूनम राठौड़ हैं। 80 में से भाजपा के 53 और कांग्रेस के 23 व अन्य 4 पार्षद हैं। अंदरखाने चर्चा: पार्षद बोराणा को बना सकते हैं डिप्टी मेयर सिंघवी को मेयर प्रत्याशी बनाए जाने से शहर भाजपा अध्यक्ष गजपाल सिंह सहित वर्तमान कार्यकारिणी के खिलाफ पंजाब राज्यपाल कटारिया समर्थक नाराज है। वहीं, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के रिश्तेदार व नवनियुक्त पार्षद पंकज बोराणा को डिप्टी मेयर बनाने की चर्चा ने विरोध को और तेज कर दिया है। कुछ पदाधिकारी ब्राह्मण चेहरे दिनेश भट्‌ट, डॉ. कविता जोशी, जतिन श्रीमाली में से किसी को डिप्टी मेयर बनाना चाहते हैं। वहीं, कुछ ओबीसी चेहरे को भी मौका देने के पक्ष में हैं। चर्चा यह भी है कि शहर विधायक ताराचंद जैन व भावी मेयर पारस सिंघवी (जैन) होंगे, लेकिन ब्राह्मण नेता हाशिए पर क्यों हैं? वोटिंग मैनेजमेंट से 2 नेताओं को हटाने की दिल्ली तक शिकायत बाड़ेबंदी के बीच प्रमोद सामर और दिनेश भट्ट के परिजन रिसॉर्ट पहुंचे। वहां पार्टी पदाधिकारियों से सवाल किया कि जब मौका नहीं देना था तो चुनाव क्यों लड़वाया? एक भाजपा पदाधिकारी से यह तक कह डाला कि जिसने आपको राजनीति में लाया, यहां तक पहुंचाया उन्हें चित्त कर जश्न मना रहे हो। भट्ट के परिजनों को जब रिसॉर्ट में नहीं घुसने दिया तो उन्होंने मुर्दाबाद के नारे लगा दिए। और कहा- वे बीमार हैं, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना है। परिजनों की नाराजगी के आगे पदाधिकारियों को झुकना पड़ा। लचर कानून: क्रॉस वोटिंग में पहचान उजागर नहीं होती मेयर चुनावों में तकनीकी रूप से पार्षद क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं, क्योंकि यह चुनाव गुप्त मतदान प्रक्रिया से होता है। इसके कारण यह साबित करना असंभव होता है कि किस पार्षद ने किसको वोट डाला है। इसके अलावा, संसद व विधानसभाओं की तरह स्थानीय निकायों में दलबदल विरोधी कानून भी लागू नहीं होता। इसलिए क्रॉस वोटिंग करने के आधार पर किसी पार्षद की सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती। कानूनी तौर पर कुर्सी सुरक्षित रहने के कारण ही पार्षदों में दलबदल का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि क्रॉस वोटिंग के खतरे को टालने के लिए पार्टियां बाड़ेबंदी का सहारा लेती हैं। आगे : मेयर को नहीं हटा सकती बगावत, 60 पार्षद जरूरी राजस्थान नपा अधिनियम, 2009 और 2017 के नियमों के तहत उदयपुर नगर निगम में केवल असंतोष या साधारण बहुमत (41 पार्षद) से मेयर को हटाना संभव नहीं है। 80 सदस्यों वाले बोर्ड में अविश्वास प्रस्ताव लाने, बैठक के कोरम और पारित कराने तीनों ही चरणों में कुल पात्र निर्वाचित पार्षदों के तीन-चौथाई बहुमत यानी कम से कम 60 पार्षदों के हस्ताक्षर व गुप्त मतदान की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही धारा 53 के अनुसार, महापौर के पदभार संभालने के शुरुआती दो वर्षों तक अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस तक नहीं दिया जा सकता। यदि दो साल बाद प्रस्ताव लाया भी जाता है और वह खारिज हो जाता है, तो अगले दो साल तक दोबारा प्रस्ताव नहीं आ सकता।