एशिया की सबसे बड़ी मार्बल मंडी किशनगढ़ बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रही है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की जांच में पहली बार केवल हवा या पानी नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरणीय तंत्र का एकीकृत अध्ययन किया गया। जांच में आया कि मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड हवा, मिट्टी, भूजल और मानव स्वास्थ्य को एक साथ प्रभावित करने वाला स्थायी स्रोत बन चुका है। पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा के नेतृत्व में 15 दिनों तक डंपिंग यार्ड में अध्ययन किया गया। इसमें एक्स-रे डिफ्रेक्शन, एटॉमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोस्कोपी, जीआईएस और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीक उपयोग की गई। खुली मार्बल स्लरी डंपिंग का असर केवल डंपिंग स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव दूर-दूर तक फैल रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध “जर्नल ऑफ हैज़र्डस मैटेरियल्स एडवांसेज’ (एल्सेवियर) जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में सोमवार 13 जुलाई-2026 को प्रकाशित हुआ है। शोध में चेतावनी दी गई है कि यदि वर्तमान तरीके से खुले में मार्बल स्लरी का डंपिंग जारी रहा तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र कृषि उत्पादकता, पेयजल उपलब्धता, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाएगा। रिपोर्ट ने इसे व्यावसायिक स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट माना है। मिट्टी और भूजल में भारी धातुओं की मौजूदगी शोध में मार्बल स्लरी के भीतर लेड (Pb) सिलिकेट और कॉपर सल्फेट जैसे भारी धातु यौगिकों की पहचान हुई। डंपिंग यार्ड के आसपास की मिट्टी में तांबा, जिंक और अन्य धातुओं की मात्रा अधिक मिली तथा दूरी बढ़ने के साथ इनकी सांद्रता कम होती गई। भूजल में बीमारियों का घर टीडीएस 3573 पीपीएम, कुल कठोरता 1010 मि.ग्रा./लीटर, लवणता, क्लोराइड, फ्लोराइड और आयरन स्वीकृत सीमा से काफी अधिक पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार इससे पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है तथा लंबे समय तक ऐसे पानी के उपयोग से किडनी, हड्डियों और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। खेती सिकुड़ रही, औद्योगिक क्षेत्र बढ़ रहा सैटेलाइट आधारित विश्लेषण से सामने आया कि वर्ष 2017 से 2022 के बीच डंपिंग यार्ड के आसपास कृषि भूमि लगातार कम हुई जबकि औद्योगिक एवं निर्मित क्षेत्र तेजी से बढ़े। निर्मित क्षेत्र 54.58 से बढ़कर 74.72 वर्ग किमी हो गया। कृषि भूमि में 2.58 प्रतिशत की कमी आई आैर वनस्पति लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि डंपिंग क्षेत्र मानचित्र में भले छोटा दिखाई दे रहा हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रदूषण कम हुआ है। वास्तव में स्लरी अब आसपास के क्षेत्रों में फैलकर व्यापक पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा रही है। भास्कर द्वारा कराई गई जांच में भी सामने आए यही तथ्य दैनिक भास्कर ने राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहयोग से किशनगढ़ मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड और उसके आसपास के क्षेत्रों में पोर्टेबल एयर मॉनिटरिंग मशीन से वायु गुणवत्ता की जांच करवाई थी। इस दौरान विभिन्न स्थानों पर हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों का आकलन किया गया। जांच में सामने आया कि डंपिंग यार्ड के आसपास धूलकण और प्रदूषण का स्तर सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक है तथा इसका प्रभाव आसपास के वातावरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बाद में राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ किए गए विस्तृत शोध में भी यही तथ्य प्रमाणित हुए। जांच में यह किया गया सर्वाधिक असर मजदूरों पर हवा में धूल राष्ट्रीय मानक से आठ गुना ज्यादा शोधार्थी बसंत बिजारणियां ने बताया कि - रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष वायु प्रदूषण को लेकर सामने आया। डंपिंग यार्ड के सबसे निकट वाले क्षेत्र में पीएम-2.5 का औसत स्तर 465 से 487 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया, जो राष्ट्रीय मानक से लगभग आठ गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सीमा से 20 से 50 गुना अधिक है। यही कारण है कि सर्वे में आधे से अधिक स्थानीय लोगों और 70 प्रतिशत मार्बल श्रमिकों ने सांस लेने में तकलीफ, जबकि 84 प्रतिशत श्रमिकों ने गले की गंभीर समस्याएं बताईं।