आज वर्ल्ड थैलेसीमिया-डे है। थैलेसीमिया एक गंभीर अनुवांशिक बीमारी है, जिससे सबसे ज्यादा छोटे बच्चे प्रभावित होते हैं। इस बीमारी से बच्चों को बचाया जा सकता है। साथ ही इस बीमारी का सफल ट्रीटमेंट भी संभव है। ये ट्रीटमेंट बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) के जरिए संभव है। वहीं, थैलेसीमिया को रोकने के लिए शादी से पहले और प्रेग्नेंसी के दौरान थैलेसीमिया स्क्रीनिंग जरूरी है। माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हों तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा करीब 25 फीसदी रहता है। ऐसे में समय पर जांच और जेनेटिक काउंसलिंग से इस बीमारी को रोका जा सकता। जयपुर में भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के सीनियर ब्लड कैंसर और बीएमटी स्पेशलिस्ट डॉ. प्रकाश सिंह शेखावत की माने तो थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों में हर 15 से 20 दिन के अंदर ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। बीएमटी से स्थायी इलाज डॉ. शेखावत ने बताया- बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) वर्तमान में थैलेसीमिया का सबसे प्रभावी और स्थायी इलाज है। इस प्रक्रिया में मरीज के खराब बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदला जाता है। इससे शरीर में सामान्य रूप से हेल्दी ब्लड बनाना शुरू हो जाता है। अगर मरीज को समय पर डोनर मिल जाए, विशेष रूप से भाई-बहन में से तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सक्सेस रेट बहुत ज्यादा और अच्छी रहती है। मैचिंग डोनर नहीं मिलने पर भी ट्रीटमेंट संभव अगर किसी मरीज को मैचिंग का डोनर नहीं मिलता है तो उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य डोनर से भी ये ट्रीटमेंट संभव है। अब हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट जैसी आधुनिक तकनीक से भी ट्रीटमेंट किया जा सकता है। डॉक्टर शेखावत ने बताया- कम उम्र में किया गया बोन मैरो ट्रांसप्लांट बेहतर रिजल्ट देता है। इससे मरीज को भविष्य में बार-बार ब्लड चढ़ाने और आयरन संबंधी दवाइयों की जरूरत नहीं रहती। उन्होंने बताया- राजस्थान में राज्य सरकार की 'मां योजना'' और केन्द्र स्तर पर 'कॉल इंडिया प्रोग्राम' के तहत थैलेसीमिया रोगी का निःशुल्क बीएमटी होता है। ये लक्षण दिखने पर करवाएं जांच शिशु कैंसर एवं रक्त रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवानी माथुर के मुताबिक- थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों में शुरुआती 6 माह से एक साल के बीच ही खून की कमी होने लगती है। इसके प्रमुख लक्षणों में शरीर में अत्यधिक कमजोरी, चेहरा पीला पड़ना, बार-बार बुखार या संक्रमण होना, भूख कम लगना, वजन और लंबाई का सही तरीके से विकास नहीं होना, पेट का फूलना, सांस फूलना तथा बच्चे का जल्दी थक जाना शामिल हैं। बच्चों में बार-बार ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। यदि बच्चे में यह लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाने के बाद थैलेसीमिया की जांच करानी चाहिए। डॉ. माथुर ने बताया कि थैलेसीमिया की रोकथाम के लिए विवाह पूर्व और गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया स्क्रीनिंग अत्यंत आवश्यक है। यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हों तो ऐसे में समय पर जांच और जेनेटिक काउंसलिंग से इस बीमारी को रोका जा सकता।