केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) जोधपुर बेंच ने सेंट्रल जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग उदयपुर के एक रिटायर्ड अधीक्षक के खिलाफ जारी आरोप पत्र को निरस्त कर दिया। ट्रिब्यूनल ने सेवा कानून से जुड़े अहम मामले में यह फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति जरूरी है। कोर्ट ने यह भी तय किया कि केवल हिरासत के कारण किया गया निलंबन, विभागीय कार्रवाई की शुरुआत नहीं माना जा सकता। मामला आवेदक श्याम सुंदर जैन का है। उन्हें रिश्वत लेते गिरफ्तार करने के बाद 48 घंटे हिरासत में रहने पर निलंबित किया गया था। 1984 में शुरू की थी सर्विस, रिटायरमेंट से पहले हुए गिरफ्तार मूल आवेदक श्याम सुंदर जैन ने वर्ष 1984 में लोअर डिवीजन क्लर्क (एलडीसी) के पद पर नौकरी शुरू की थी। प्रमोशन के बाद वे सेंट्रल जीएसटी आयुक्तालय उदयपुर में अधीक्षक बने। सेवानिवृत्ति से पहले मई 2020 में राजलक्ष्मी ट्रांसपोर्ट कंपनी के किरण सिंह की शिकायत पर एसीबी ने रिश्वत मांगने के आरोप में उनके खिलाफ केस दर्ज किया था। 25 मई 2020 को गिरफ्तारी के बाद कोर्ट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। हिरासत के कारण विभाग ने किया था निलंबित गिरफ्तारी के बाद एक्शन लेते हुए जीएसटी कमिश्नर ने 28 मई 2020 को आदेश जारी कर आवेदक को 25 मई से ही 'डीम्ड सस्पेंशन' (माना हुआ निलंबन) पर रख दिया। यह निलंबन 48 घंटे से अधिक हिरासत में रहने के आधार पर था, न कि किसी प्रस्तावित विभागीय जांच की मंशा से। इसके बाद 30 नवंबर 2020 को आवेदक सेवानिवृत्त हो गए। रिटायरमेंट से पहले उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। रिटायरमेंट के दो साल बाद दिया आरोप पत्र रिश्वत का मामला दर्ज होने के करीब ढाई साल बाद 29 दिसंबर 2022 को जीएसटी आयुक्त उदयपुर ने नियमों का हवाला देते हुए आवेदक के खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी। आवेदक ने कार्रवाई रोकने के लिए अपील दायर की, लेकिन जब वह खारिज हो गई, तो उन्होंने कैट जोधपुर में विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी। बिना मंजूरी कार्रवाई को बताया गैरकानूनी आवेदक की ओर से एडवोकेट सपना वैष्णव ने ट्रिब्यूनल के समक्ष तर्क रखा कि सीसीएस (पेंशन) नियम-1972 के अनुसार रिटायरमेंट के बाद किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति जरूरी है। बिना स्वीकृति के जारी किया गया यह आरोप पत्र (चार्जशीट) विधिसम्मत नहीं है। विभाग की ओर से एडवोकेट के.एस. यादव ने तर्क दिया कि चूंकि आवेदक रिटायरमेंट से पहले ही सस्पेंड हो गए थे, इसलिए नियमों के तहत विभागीय कार्रवाई निलंबन की तारीख 25 मई 2020 से ही शुरू मानी जानी चाहिए। ऐसे में राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता ही नहीं है। कैट: निलंबन और विभागीय कार्रवाई में सीधा संबंध नहीं जस्टिस रामेश्वर व्यास और डॉ. अमित सहाय की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद विभाग का तर्क खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा- निलंबन की तारीख को विभागीय जांच की शुरुआत तभी माना जा सकता है, जब निलंबन और प्रस्तावित विभागीय कार्रवाई के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध हो। इस मामले में निलंबन केवल हिरासत के कारण था, विभागीय जांच के लिए नहीं। ट्रिब्यूनल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना जारी किए गए 29 दिसंबर 2022 के आरोप पत्र को नियमों का उल्लंघन मानते हुए पूरी तरह निरस्त कर दिया।