गाड़िया लुहार, नट, सपेरा, सांसी आदि ऐसी जातियां जो एक स्थान पर नहीं टिकते और जहां पढ़ना लिखना किसी अपराध से कम नहीं माना जाता। इन जातियों के बच्चे अब कॅालेज में पहुंच रहे हैं। घुमंतु जातियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए आरएसएस से संबद्ध घुमंतु जाति उत्थान प्रकल्प के प्रयास अब सफल हो रहे हैं। इस साल 12 वीं में दो और 10 वीं में तीन बच्चों ने सफलता हासिल की है। इसमें 12 वीं की परीक्षा में मुकेश ने 88 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं। प्रकल्प, अब उसे पीएमटी की तैयारी करा रहा है। इसके अलावा भारती का कालेज में एडमिशन कराया गया है। गुरुकुल पद्धति से शिक्षा और संस्कार छात्रावास में दो बड़े हॉल, वार्डन रूम, रसोई, लैटबाथ हैं। फिलहाल इसमें 45 बच्चों के आवास की व्यवस्था है। यहां गुरुकुल पद्धति से शिक्षा और संस्कार दिए जा रहे हैं। सुबह हवन, प्रार्थना, योग, खेल, संगीत शिक्षा आदि कार्यक्रम होते हैं। संरक्षक गोविंद गुप्ता ने बताया कि इस प्रकल्प का मकसद घुमंतू जातियों के बच्चों को शिक्षा के जरिए आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। संस्था के सदस्य समय-समय पर गाडिया लुहार बस्तियों में जाकर बच्चों और उनके परिजनों को शिक्षा के महत्व के बारे में समझाते हैं। कई बार बच्चों को स्कूल भेजने के लिए विशेष प्रयास भी किए जाते हैं। प्रकल्प के तहत बच्चों को नि:शुल्क यूनिफॉर्म, किताबें, कॉपियां और अन्य जरूरी शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। 2012 में शुरू हुआ था प्रकल्प, लगातार विस्तार जारी पक्के घरों से दूर और समाज की मुख्यधारा से कटे गाडिया लुहार समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए 2012 से घुमंतु जाति उत्थान प्रकल्प चलाया जा रहा है। इसका रणजीत नगर में महाराणा प्रताप हास्टल भी हैं, जहां 45 बच्चों के आवास, भोजन, पाठ्य सामग्री और यूनिफार्म की निशुल्क व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा 75 बच्चे ऐसे हैं, जो अपने घरों पर रहते हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई और यूनिफार्म आदि की खर्च संस्था उठाती हैं। इसमें 26 बेटियां हैं। संस्था के अध्यक्ष शंकरलाल अग्रवाल ने बताया कि अब तक करीब 240 बच्चों को इस प्रकल्प से जोड़ा जा चुका है। फिलहाल 120 बच्चों का संस्था खर्च उठा रही हैं। प्रतिवर्ष करीब 30 लाख रुपए खर्च जन सहयोग से होता है।