खेती के साथ पशुपालन आज भी गांवों की अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी है। ऐसे में अगर पशुओं की नस्ल बेहतर हो तो कम लागत में ज्यादा आमदनी मिल सकती है। इसी सोच के साथ चित्तौड़गढ़ शहर से कुछ दूरी पर बोजूंदा स्थित पशु अनुसंधान केंद्र काम कर रहा है। यह केंद्र सिर्फ बकरियां पालने की जगह नहीं है, बल्कि यहां वैज्ञानिक तरीके से सिरोही नस्ल की बकरियों का संरक्षण, संवर्धन और नस्ल सुधार का काम किया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि यहां तैयार किए जा रहे बेहतर नस्ल के बकरे सीधे किसानों तक पहुंचाए जाते हैं, ताकि गांवों में मौजूद देसी बकरियों की नस्ल सुधरे और पशुपालकों की आय बढ़ सके। केंद्र के एलएससी ईश्वर सिंह तंवर बताते हैं कि उनका उद्देश्य सिर्फ अनुसंधान करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसका सीधा फायदा गांव के पशुपालकों को मिले। यही वजह है कि यहां हर व्यवस्था किसानों की जरूरत को ध्यान में रखकर बनाई गई है और लगातार नए प्रयोग भी किए जा रहे हैं। हर बकरी की नियमित जांच की जाती है, ताकि बीमारी का शुरुआती स्तर पर ही पता चल सके। वैज्ञानिक तरीके से देखभाल होने के कारण यहां तैयार होने वाले ब्रीडर बकरे बेहतर गुणवत्ता के होते हैं। सिरोही नस्ल पर फोकस, तैयार किए जा रहे बेहतर ब्रीडर बकरे ईश्वर सिंह तंवर ने बताया कि राजस्थान में बकरियों की कई नस्लें हैं, लेकिन चित्तौड़गढ़ के इस केंद्र में फिलहाल सिरोही नस्ल पर विशेष रूप से काम किया जा रहा है। इसके पीछे वजह यह है कि सिरोही नस्ल को मजबूत, जल्दी बढ़ने वाली और बकरी पालन के लिए लाभदायक माना जाता है। केंद्र में अच्छी गुणवत्ता वाले नर बकरे यानी ब्रीडर तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन्हें गांवों में पशुपालकों तक पहुंचाया जाता है, ताकि स्थानीय देसी बकरियों का प्रजनन बेहतर नस्ल के बकरों से हो सके। तंवर के अनुसार इससे धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में बकरियों की नस्ल में सुधार होता है और आने वाली पीढ़ी पहले से ज्यादा अच्छी होती है। यही नस्ल सुधार आगे चलकर किसानों की आमदनी बढ़ाने का सबसे बड़ा आधार बनता है। किसानों के लिए दो आसान योजनाएं, सिर्फ 20 रुपए में भी मिल रही सुविधा केंद्र सिर्फ अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के लिए दो आसान योजनाएं भी चला रहा है। ईश्वर सिंह तंवर बताते हैं कि अगर कोई पशुपालक अपनी बकरी को बेहतर नस्ल के बकरे से प्रजनन कराना चाहता है तो वह अपनी बकरी केंद्र पर ला सकता है। इसके लिए सरकार ने केवल 20 रुपए का शुल्क तय किया है। वहीं जिन किसानों के पास 30, 40, 50 या उससे ज्यादा बकरियां हैं, उन्हें जरूरत के अनुसार केंद्र से ब्रीडर बकरा उपलब्ध कराया जाता है। किसान उस बकरे को अपने गांव ले जाकर अपनी सभी बकरियों का प्रजनन करा सकते हैं। इससे बार-बार केंद्र आने की जरूरत भी नहीं पड़ती और गांव स्तर पर ही नस्ल सुधार का काम आगे बढ़ता है। तंवर का कहना है कि इन योजनाओं का अच्छा फायदा पशुपालकों को मिल रहा है और लगातार लोग इस सुविधा का लाभ लेने पहुंच रहे हैं। 250 से ज्यादा बकरियां, हर उम्र के हिसाब से अलग देखभाल इस समय केंद्र में 250 से ज्यादा सिरोही नस्ल की बकरियों का पालन किया जा रहा है। यहां पूरी व्यवस्था वैज्ञानिक तरीके से बनाई गई है। परिसर में करीब 10 अलग-अलग बाड़े (ब्लॉक) हैं, जहां बकरियों और उनके बच्चों को उम्र के हिसाब से रखा जाता है। जन्म से तीन महीने, तीन से छह महीने, छह से नौ महीने और नौ से बारह महीने तक के बच्चों के लिए अलग-अलग समूह बनाए गए हैं। इसके अलावा एक ब्लॉक में चिकित्सा इकाई, एक ब्लॉक मिल्किंग, एक ब्लॉक में किडिंग का भी होता है। इससे उनके खान-पान, वजन, स्वास्थ्य और विकास पर आसानी से नजर रखी जा सकती है। बड़ी बकरियों को दिन में चरने के लिए जंगल भेजा जाता है, जिससे उन्हें प्राकृतिक चारा मिलता है। वहीं छोटे बच्चों को सुरक्षा के साथ परिसर में रखा जाता है, ताकि उन्हें किसी तरह का खतरा न हो और उनका विकास बेहतर तरीके से हो सके। सिरोही बकरी की खासियत सिरोही नस्ल की बकरियां करीब ढाई से तीन फीट ऊंची होती हैं। अच्छी देखभाल मिलने पर एक साल की उम्र में इनका वजन 40 से 45 किलो तक पहुंच जाता है। जन्म के समय बच्चे का वजन लगभग 7 किलो होता है और यह नस्ल अक्सर एक साथ दो बच्चों को जन्म देती है। बकरी पालन में इनकी देखभाल पर सालाना करीब 10 से 12 हजार रुपये खर्च आता है, इसलिए कम लागत में भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। यह बकरी साल में दो बार बच्चे देने की क्षमता रखती है और इसकी उम्र 12 से 15 साल तक हो सकती है। सिरोही बकरियों का रंग आमतौर पर सफेद होता है, जिस पर हल्के या गहरे भूरे रंग के धब्बे होते हैं। कुछ बकरियां पूरी तरह सफेद भी होती हैं। इनके शरीर पर छोटे और घने बाल, लंबे नीचे लटके कान तथा नर और मादा दोनों में छोटे, ऊपर और पीछे की ओर मुड़े हुए सींग पाए जाते हैं। बीमारियों से बचाव पर पूरा फोकस, स्वास्थ्य की लगातार निगरानी बकरी पालन में बीमारियां सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती हैं। इसे देखते हुए केंद्र में स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। खुर-पक्का और मुंह-पक्का जैसी सामान्य लेकिन गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए समय-समय पर टीकाकरण किया जाता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दवाइयां भी दी जाती हैं। हर बकरी की नियमित निगरानी की जाती है, ताकि किसी भी बीमारी का पता शुरुआती स्तर पर ही चल सके। यही कारण है कि यहां बकरियों की मृत्यु दर कम रखने और उन्हें स्वस्थ बनाए रखने पर विशेष काम किया जा रहा है। वैज्ञानिक तरीके से देखभाल होने के कारण यहां तैयार होने वाले ब्रीडर बकरे भी बेहतर गुणवत्ता के होते हैं।