चित्तौड़गढ़ के परिवहन विभाग में 20 इंस्पेक्टर के पद स्वीकृत होने के बावजूद सिर्फ 5 ही तैनात हैं, जबकि 15 पद खाली पड़े हैं। ऊपर से ARTO और DTO जैसे अहम पद भी नियमित रूप से भरे नहीं हैं और अतिरिक्त चार्ज के भरोसे काम चल रहा है। ऐसे हालात में जहां एक तरफ विभाग के कामकाज की रफ्तार धीमी पड़ी है। वहीं दूसरी तरफ आम लोगों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इस बीच विभाग को 337 करोड़ रुपए का बड़ा रेवेन्यू टारगेट भी दिया गया है। कम स्टाफ में कई जिम्मेदारियां, व्यवस्था असंतुलित जो 5 इंस्पेक्टर मौजूद हैं, उनमें भी काम का बंटवारा संतुलित नहीं है। एक इंस्पेक्टर को पूरे ऑफिस में लाइसेंस से जुड़े सभी काम देखने पड़ रहे हैं, जिससे बाकी कामों के लिए स्टाफ और कम पड़ जाता है। वहीं तीन इंस्पेक्टर्स को निंबाहेड़ा, रावतभाटा और बेगूं जैसे सब ऑफिस का जिम्मा भी दिया गया है और साथ में फील्ड की ड्यूटी भी करनी पड़ रही है। इस तरह एक ही अधिकारी को कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है। इससे न केवल काम में देरी हो रही है, बल्कि निगरानी और जांच जैसे जरूरी काम भी प्रभावित हो रहे हैं। नाम भर के स्टाफ पर पूरे जिले का भार वर्तमान में मोहम्मद शकील, विक्रम सालवी, सतीश मीणा, हरगोविंद गुर्जर और रविन्द्र झुरिया ही विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जिले में इतने कम स्टाफ के साथ परिवहन व्यवस्था को संभालना प्रैक्टिकल रूप से कठिन है। नियमों की पालना करवाना, गाड़ियों की जांच करना, अवैध गतिविधियों पर रोक लगाना और लाइसेंस से जुड़े काम एक साथ करना पड़ रहा है। ऐसे में कई काम अधूरे रह जाते हैं या फिर प्राथमिकता के आधार पर कुछ काम आगे बढ़ाए जाते हैं, जिससे बाकी काम पीछे छूट जाते हैं। ऊपरी पद खाली, अतिरिक्त चार्ज से चल रहा सिस्टम चित्तौड़गढ़ में ARTO का पद रिक्त है और DTO का भी स्थायी अधिकारी नहीं है। दोनों पदों का अतिरिक्त चार्ज प्रतापगढ़ के DTO नीरज शाह को दिया गया है। एक ही अधिकारी को दो जिलों का काम देखना पड़ रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर फैसले लेने में देरी होती है और कई मामलों में तुरंत कार्रवाई नहीं हो पाती। यह व्यवस्था अस्थायी तौर पर तो चल सकती है, लेकिन लंबे समय तक इससे कामकाज प्रभावित होना तय है। सस्पेंशन और ट्रांसफर से बढ़ी खाली जगहें विभाग में खाली पदों की एक वजह हाल के सस्पेंशन और ट्रांसफर भी हैं। पिछले एक साल में कुछ इंस्पेक्टरों को निलंबित किया गया है, जबकि कुछ का ट्रांसफर कर दिया गया। इन पदों पर अब तक नई नियुक्ति नहीं हुई है, जिससे पहले से मौजूद कमी और बढ़ गई है। स्टाफ की कमी के कारण विभाग को सीमित संसाधनों में काम चलाना पड़ रहा है। इससे काम की गति धीमी हो गई है और कई बार जरूरी कार्रवाई भी समय पर नहीं हो पाती। आम लोगों को उठानी पड़ रही सीधी परेशानी इस पूरी स्थिति का असर सीधे तौर पर आम जनता पर पड़ रहा है। लाइसेंस बनवाने, गाड़ियां ट्रांसफर कराने या अन्य कामों के लिए लोगों को बार-बार ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कई बार एक ही काम के लिए कई दिन इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोगों के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उन्हें लंबी दूरी तय करके आना पड़ता है और फिर भी काम तुरंत नहीं हो पाता। ऐसे में लोगों में असंतोष बढ़ रहा है और व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। बड़े लक्ष्य के बीच कमजोर व्यवस्था, चुनौती बढ़ी इन परिस्थितियों के बीच परिवहन विभाग को वित्तीय साल 2026-27 के लिए 337 करोड़ रुपए का रेवेन्यू टारगेट दिया गया है। यह लक्ष्य पहले ही बड़ा है, और मौजूदा स्टाफ की स्थिति को देखते हुए इसे हासिल करना और भी कठिन हो गया है। अगर जांच और निगरानी ठीक से नहीं होगी, तो रेवेन्यू पर भी असर पड़ेगा।