राना (Rajasthan Association of North America) के अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के अंतरराष्ट्रीय संयोजक प्रेम भंडारी ने राजस्थानी भाषा के संरक्षण, संवर्धन एवं संवैधानिक मान्यता की दिशा में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े की ओर से उठाए गए दूरदर्शी कदमों के लिए उनका हार्दिक आभार व्यक्त किया है। भंडारी ने विशेष रूप से राज्यपाल द्वारा प्रदेश के 11 राज्य विश्वविद्यालयों में राजस्थानी अध्ययन केंद्र (Rajasthani Study Centres) स्थापित करने के निर्देश का स्वागत करते हुए इसे राजस्थानी भाषा के लंबे संघर्ष में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि इन अध्ययन केंद्रों के माध्यम से राजस्थानी भाषा के अध्ययन, अध्यापन, शोध, प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन), प्रकाशन तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी और युवा पीढ़ी में अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व और जागरूकता बढ़ेगी। भंडारी बोले- 2003 में अंतरराष्ट्रीय राजस्थानी सम्मेलन इसका महत्वपूर्ण पड़ाव था भंडारी ने कहा कि इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 4 जुलाई, 2003 को न्यूयॉर्क में आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय राजस्थानी सम्मेलन के दौरान आया, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी भाषा को शामिल करने की अनुशंसा के लिए एक ज्ञापन सौंपा गया। यह ज्ञापन तत्कालीन राना अध्यक्ष के.के. मेहता और डॉ. शशि शाह द्वारा प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने बताया कि तत्कालीन राजस्थान सरकार ने अपने वचन का सम्मान करते हुए मात्र 51 दिनों के भीतर, 25 अगस्त, 2003 को राजस्थान विधानसभा से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा भारत सरकार को भेज दी। दुर्भाग्यवश, राजस्थान विधानसभा की सर्वसम्मत अनुशंसा के बावजूद यह विषय पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत सरकार के स्तर पर लंबित है। भंडारी ने आगे बताया कि साल 2011 में उनके नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल से राष्ट्रपति भवन में मुलाकात कर राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की मांग का ज्ञापन सौंपा। इस प्रतिनिधिमंडल में तत्कालीन संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, बाद में भारत के उपराष्ट्रपति बने जगदीप धनखड़, राज के. पुरोहित, विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, संघर्ष समिति के पदाधिकारी और अनेक प्रतिष्ठित विद्वान एवं समाजसेवी शामिल थे। राजस्थान के सांस्कृतिक संरक्षण को मिलेगी नई दिशा भंडारी ने कहा कि राजस्थानी करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली भारत की एक समृद्ध भाषा है, जिसकी गौरवशाली साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परंपरा है। उन्होंने बताया कि डॉ. सीताराम लालस द्वारा तैयार किया गया 2.10 लाख से अधिक शब्दों वाला राजस्थानी शब्दकोश इस भाषा की समृद्धि, गहराई और परिपक्वता का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से शिक्षा, साहित्य, शोध, प्रशासन तथा सांस्कृतिक संरक्षण को नई दिशा मिलेगी। साथ ही राजस्थानी भाषी विद्यार्थियों को संघ लोक सेवा आयोग सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी मातृभाषा का उपयोग करने का अवसर मिलेगा, जिससे नई पीढ़ी के लिए शिक्षा एवं रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। भंडारी ने यह भी दोहराया कि जब तक राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिलता, तब तक राजस्थान सरकार को राजस्थानी को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए, जैसा कि देश के अनेक राज्यों ने अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए किया है। राज्यपाल का जताया आभार उन्होंने कहा कि राज्यपाल की हालिया पहल से विश्वभर में बसे राजस्थानी प्रवासियों, साहित्यकारों, भाषा प्रेमियों, शिक्षाविदों एवं सामाजिक संगठनों का मनोबल बढ़ा है। उन्हें विश्वास है कि राज्य के विश्वविद्यालयों में स्थापित होने वाले राजस्थानी अध्ययन केंद्र भविष्य में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम सिद्ध होंगे। भंडारी ने विश्वास व्यक्त किया कि राना तथा विश्वभर का राजस्थानी समाज लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपना अभियान तब तक जारी रखेगा, जब तक राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में उसका उचित स्थान नहीं मिल जाता।