आज गुरु पूर्णिमा है। इस खास मौके पर राजस्थान के ऐसे दो गुरू (शिक्षकों) से मिलवाते हैं, जिन्होंने अपने जज्बे से हजारों बच्चों की जिंदगी बदल दी। एक तरफ हैं, जयपुर की सरकारी टीचर शिल्पी शाह, जिन्होंने कच्ची बस्तियों में जाकर स्कूल छोड़ चुके बाल श्रमिक बच्चों को ढूंढा, उनके माता-पिता को समझाया और फिर से स्कूल की चौखट तक लाईं। दूसरी तरफ हैं मैथ में बच्चों को चैंपियन बनाने वाले मोतीराम सर। जहां बच्चे गणित का नाम सुनकर खौफ खाते थे, आज वही बच्चे चुटकियों में सवाल सॉल्व कर रहे हैं। खास बात यह है कि इसके लिए उन्होंने कभी फीस की शर्त नहीं रखी। पढ़िए ये रिपोर्ट... शिल्पी शाह पिता कहते थे- लड़की पढ़कर क्या करेगी, उसी ने संवारा हजारों बच्चों का भविष्य जयपुर के जवाहर नगर सरकारी स्कूल में टीचर शिल्पी शाह की कहानी एक ऐसे घर से शुरू होती है, जहां बेटियों की पढ़ाई को जरूरी नहीं माना जाता था। सिरोही की शिल्पी बताती हैं कि उनके पिता लड़कियों की पढ़ाई के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि बेटियां आखिर शादी करके घर ही संभालेंगी। लेकिन उनकी मां ने पिता को समझाया- अगर बेटी पढ़ेगी, तभी उसका भविष्य बनेगा। मां के इसी फैसले ने शिल्पी की जिंदगी बदल दी। पढ़ाई पूरी होने के बाद शिल्पी की एक बिजनेसमैन से शादी हुई और वे पति के साथ मुंबई शिफ्ट हो गईं। सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन कुछ ही सालों में पति की तबीयत बिगड़ने लगी। व्यापार में लगातार घाटा हुआ और परिवार आर्थिक संकट में आ गया। ऐसे समय में शिल्पी ने हार मानने के बजाय फिर से अपनी पढ़ाई को हथियार बनाया। प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ सरकारी टीचर बनने की तैयारी शुरू की। मेहनत का ही परिणाम था कि उनका चयन राजस्थान में टीचर भर्ती में हो गया। अफवाह फैलाई- ये बच्चों को चुराने आई है एक दिन स्कूल जाते समय उनकी नजर सड़क किनारे खेल रहे बच्चों पर पड़ी। कुछ कूड़ा बीन रहे थे, कुछ छोटे-मोटे काम कर रहे थे। उनके मन में एक ही सवाल उठा- 'शिक्षा अगर अधिकार है, तो ये बच्चे स्कूल से बाहर क्यों हैं? शिल्पा बताती हैं- अगले ही दिन उन्होंने उन बच्चों और उनके परिवारों से बात करने की ठानी। लेकिन जब भी वे जाती, बच्चे उनसे डरकर भाग जाते। परिवार बात करने से मना कर देते। आसपास के लोगों ने अफवाह फैला दी कि- ये औरत बच्चों को चुराने आई है। कई बार उन्हें अपमानित होकर लौटना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे रोज बस्ती जाती रहीं। कभी बच्चों के साथ बैठीं, कभी उनके साथ खाना खाया, कभी माता-पिता की परेशानियां सुनीं। धीरे-धीरे परिवारों ने भी भरोसा करना शुरू किया। उनके भी समझ में आया कि बच्चों के लिए पढ़ाई जरूरी है। इसके बाद शिल्पी ने स्कूल छोड़ चुके बच्चों को एक बार फिर से स्कूल लाना शुरू किया। 1000 से ज्यादा बच्चों को स्कूल पहुंचाया शिल्पी शाह अब तक पढ़ाई छोड़ चुके एक हजार से ज्यादा बच्चों का फिर से स्कूल शुरू कर चुकी हैं। उन्होंने सामाजिक सहयोग से कई सरकारी स्कूलों की मरम्मत करवाई, नए कमरे बनवाए, बच्चों के लिए किताबें, स्कूल बैग भी उपलब्ध करवाए हैं। जो बच्चे बड़े हो जाते हैं, उनके लिए वे स्किल डेवलपमेंट पर भी काम करती हैं IAS बेटा कहता है- मेरी पहली गुरु मेरी मां हैं करीब 7 साल पहले हार्ट अटैक से शिल्पी के पति का निधन हो गया। यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। लेकिन उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। बेटे की एजुकेशन में भी पूरा सपोर्ट किया। बेटा आज आईएएस की ट्रेनिंग कर रहा है। वे कहती हैं- मैंने उसे सिर्फ पढ़ाई नहीं, लोगों का दर्द समझना भी सिखाया है। यही कारण है कि वो मुझे अपनी पहली गुरु मां कहता है। मुझे विश्वास है कि वह एक संवेदनशील अधिकारी बनेगा, क्योंकि उसने किताबों से पहले समाज को पढ़ा है। मोतीराम सर गणित का नाम सुनकर भागते थे बच्चे, अब कैलकुलेटर को देते हैं मात नागौर के धामणियां के मोतीराम सर की कहानी अलग है। जो बच्चे गणित का नाम सुनकर डर जाते थे, आज वही बच्चे कैलकुलेटर से पहले कैलकुलेशन कर लेते हैं। इस सफर की शुरुआत तब हुई जब मोतीराम पहली बार बीएड की इंटर्नशिप के लिए एक सरकारी स्कूल पहुंचे। उन्होंने देखा कि बच्चों को अंग्रेज़ी में 1 से 100 तक की गिनती भी नहीं आती थी। मैथ्स उनके लिए सबसे मुश्किल सब्जेक्ट था। मोतीराम बताते हैं- मुझे लगा कि अगर शहर के बच्चे तेजी से सीख सकते हैं तो गांव के बच्चे क्यों नहीं? यहीं से उन्होंने एक प्रयोग शुरू किया। Abacus और Mental Maths को माध्यम बनाया और बच्चों को समझाने की शुरुआत की। शुरुआत आसान नहीं थी। बच्चे नई तकनीक से अनजान थे। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खेल-खेल में इसे सीखना शुरू किया। अबेकस तकनीक में पहले बच्चे फ्रेम पर सवाल हल करते हैं, फिर धीरे-धीरे बिना किसी सहारे के पूरी कैलकुलेशन करने लगते हैं। खुद टॉपर रहे, अब दूसरों को टॉपर बनाने का सपना मोतीराम खुद 10th के टॉपर रहे। शिक्षक बनने का सपना लेकर उन्होंने बी.एड. किया। इसी दौरान इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने बच्चों को नए तरीके से मैथ सिखाना शुरू किया। मोतीराम बताते हैं- 'मैं चाहता था कि गांव के बच्चे एग्जाम में सिर्फ पास न हों, बल्कि आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। मैं चाहता हूं कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी किसी सब्जेक्ट में पीछे नहीं हरे। टीचर्स को भी दे रहे ट्रेनिंग मोतीराम अब सरकारी स्कूलों के टीचर्स को भी Abacus और Mental Maths की ट्रेनिंग दे रहे हैं। जिससे कि यह मॉडल ज्यादा से ज्यादा स्कूलों तक पहुंच सके। उनका मानना है कि शिक्षा में सबसे बड़ी खाई गांव और शहर, हिंदी और अंग्रेजी के बीच बन गई है। अगर पढ़ाने का तरीका बदल दिया जाए तो यह दूरी आसानी से कम की जा सकती है।