नगर निगम की कार्यशैली इन दिनों किसी आश्चर्य से कम नहीं है। निगम के गलियारों में ऐसी खामोशी है, मानो शहर की तमाम समस्याएं जादू से हल हो गई हों। कागजों में विकास का राम-राज्य दिखाने वाले निगम के पास इस बात का जवाब नहीं है कि जब सड़कें टूटी हैं और नालियां उफन रही हैं, तो निर्माण शाखा में सन्नाटा क्यों पसरा है? अधिकारियों का रवैया ऐसा है जैसे शहर में अब कहीं कोई काम शेष नहीं। भास्कर पड़ताल में एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। शहर के 80 वार्डों में से अधिकांश में विकास ठप है। निगम की ‘’चयनात्मक नीति’’ के तहत केवल वार्ड संख्या 72, 52, 77, 3 और पश्चिम विधानसभा के चुनिंदा चंद वार्डों में ही इक्का-दुक्का काम चल रहे हैं। शेष पूरा बीकानेर विकास की बाट जोह रहा है। इस चयनात्मक विकास नीति ने पार्षदों के बीच भी असंतोष की आग सुलगा दी है। बीकानेर के लोग अब मेयर काल को याद कर रहे हैं, जब कम से कम हर वार्ड में समानता से विकास कार्य तो होते थे। वर्तमान ‘प्रशासक राज’’ में निर्माण शाखा पूरी तरह मौज मोड़ में है। आमजन की दुश्वारियों से निगम का कोई सरोकार नजर नहीं आता। प्रशासन ने मान लिया है कि बीकानेर की बाकी जनता को अब बेहतर सड़कों, सुचारू ड्रेनेज या बुनियादी ढांचे की आवश्यकता ही नहीं है। निर्माण शाखा की चुप्पी पर उठते सवाल जब शहर के मुख्य चौक, पुलिया और रिहायशी इलाके विकास के लिए कराह रहे हैं तब निगम की निर्माण शाखा की निष्क्रियता है। क्या शहर के बजट का पैसा कहीं और खपाया जा रहा है? या फिर निर्माण शाखा के अधिकारियों को आमजन की दुश्वारियों से कोई सरोकार नहीं है? 80 वार्डों वाले शहर में केवल 8-9 वार्डों में काम होना और बाकी को उपेक्षित छोड़ देना सीधे तौर पर पक्षपात है। जब मेयर थे तो हर वार्ड में न्यूनतम 20 लाख से एक करोड़ तक के एक वार्ड में काम होते थे मगर जब से प्रशासक राज आया तब से वार्डों की समानता का पैमाना चकनाचूर हो गया। कड़वा सच- मौन हैं विकास के दूत कार्यकाल खत्म हो गया तो निवर्तमान पार्षद भी अब उतने चक्कर निगम के नहीं लगाते जितने पहले लगाते थे। वजह साफ है। परिसीमन हो गया और वार्डों की लॉटरी भी नहीं हुई। पता नहीं वे चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं। इसलिए वो सब अपनी गणित देख रहे हैं इसलिए समस्याओं से ज्यादा वास्ता रहा नहीं। “ऐसा नहीं है कि जरूरत नहीं है। जरूरत तो बहुत ज्यादा है। जो नया इलाका निगम एरिया में जोडा गया वहां तो बेसिक काम की ही जरूरत हैं। पर फंड की उपलब्धता को देखते हुए आयुक्त निर्णय करेंगे।” -यशपाल आहूजा, उपायुक्त नगर निगम