रासायनिक खाद का अत्यधिक इस्तेमाल रोकने के लिए "खेत बचाओ अभियान' चलाया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को जागरूक कर रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान ने मिट्‌टी और पानी के अनुसार जिलावार उर्वरक सिफारिशों को लेकर गाइडलाइन जारी की है। वर्ष 2023 से 25 के मिट्टी के नमूनों के विश्लेषण के बाद खरीफ धान, रबी धान, गेहूं, गन्ना, खरीफ मक्का और रबी मक्का के लिए खाद की मात्रा की नई अनुशंसा की गई है। राजस्थान में रेतीली जमीन से लेकर हाड़ौती के काली मिट्टी वाले इलाकों तक हर जिले की मिट्टी की जांच और वहां की वास्तविक पैदावार के आधार पर अलग-अलग सिफारिशें हैं। अधिकांश जिलों में यूरिया और डीएपी की खुराक में कटौती की गई है। राजस्थान में गेहूं की फसल के लिए पोटाश की अनुशंसित मात्रा को पहले शून्य माना जाता था, अब मिट्टी की वास्तविक जरूरत को देखते हुए इसके उपयोग की सिफारिश की गई है। अलवर, बारां, भरतपुर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, धौलपुर, करौली और प्रतापगढ़ जैसे भारी मिट्टी और पर्याप्त पानी वाले जिलों में सर्वाधिक 120 किलो प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की सिफारिश की गई है। इसके विपरीत बांसवाड़ा, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, फलोदी और उदयपुर जैसे जिलों में यह खुराक आधी से भी कम यानी 50 किलो प्रति हेक्टेयर ही अनुशंसित की गई है। वहीं झुंझुनूं जिले के लिए 65 किलो प्रति हेक्टेयर मात्रा तय की गई है। धान में हनुमानगढ़ जिला सबसे आगे है, जहां सर्वाधिक 85 किलो प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की जरूरत बताई गई है, जबकि झुंझुनूं सहित अन्य जिलों में धान के लिए 50 किलो प्रति हेक्टेयर मात्रा अनुशंसित है। भीलवाड़ा, जयपुर और सवाई माधोपुर में 105 किलो, बालोतरा, ब्यावर, डीग, डूंगरपुर, केकड़ी, खैरथल-तिजारा, कोटा, पाली में 90 किलो, हनुमानगढ़, सीकर और टोंक के लिए 85 किलो, अजमेर में 75, राजसमंद व सिरोही के लिए 70–70 किलो यूरिया की सिफारिश की गई है। वहीं, धान के लिए पहले पूरे राज्य में 90:60:60 का पैमाना था। जिसे अब समान रूप से 50 किलो यूरिया, 30 किलो डीएपी और 20 किलोग्राम पोटाश निर्धारित कर दिया गया है।