चिकित्सा और शैक्षणिक जगत से ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसने जिसने डॉक्टरों की डिग्री और शोध की साख तार-तार कर दी है। भास्कर पड़ताल में आया है कि पीजी और पीएचडी की थीसिस बाजार में बिक रही हैं। एमडी-एमएस करने वाले रेजिडेंट अस्पतालों में मरीजों पर शोध करने के बजाय 20 से 50 हजार में खरीद रहे हैं। वहीं, पीएचडी शोधार्थी 80 हजार से एक लाख रुपए में डॉक्टर की उपाधि हासिल कर रहे हैं। आरएनटी मेडिकल कॉलेज और एमबी चिकित्सालय के सामने कारोबार चल रहा है। उदयपुर के एक सरकारी सहित 6 मेडिकल कॉलेजों में सैकड़ों छात्र विशेषज्ञता की पढ़ाई करते हैं, जिनके क्लीनिकल रिसर्च डेटा की विश्वसनीयता पर अब गंभीर सवाल खड़े होते हैं। एथिकल कमेटी और गाइड के सुपरविजन पर सवाल हर मेडिकल कॉलेज में इंस्टीट्यूशनल एथिकल कमेटी शोध के नैतिक और वैज्ञानिक पहलुओं की जांच करती है। तीन वर्षों तक मरीजों के फॉलो-अप और लैब टेस्ट की निगरानी गाइड की जिम्मेदारी होती है। जबकि 24 घंटे में थिसिस तैयार होने का दावा बताता है कि व्यावहारिक स्तर पर डेटा का पर्याप्त सत्यापन नहीं हो रहा। केस-1 : मरीज की जरूरत नहीं, गाइड की मंजूरी ले आओ भास्कर रिपोर्टर पीजी डॉक्टर का साथी बनकर आरएनटी के सामने संचालित बापना एजेंसीज पहुंचा। संचालक संदीप बापना से प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (पीएसएम) विभाग की थीसिस तैयार कराने की बात हुई तो ये चौंकाने वाले दावे सामने आए। केस-2 : हमारा काम सॉफ्टवेयर भी नहीं पकड़ पाता भास्कर टीम सुविवि मार्ग पहुंची। बोहरा गणेशजी मंदिर मार्ग स्थित विनायक कम्प्यूटर पर पवन ने थीसिस तैयार करने वालों के नंबर दिए। इन्हीं नंबरों पर रिपोर्टर ने हितेश नासा से संपर्क किया। उनसे बातचीत... पीएचडी की थीसिस लिखवानी है, काम हो जाएगा क्या? हां, सिर्फ टॉपिक दीजिए, पूरी थीसिस तैयार कर देंगे। खर्च कितना आएगा? 80 हजार से 1 लाख रु. लगेंगे। पीएचडी करने वाले को एक अक्षर भी लिखने की जरूरत नहीं। प्लेजियरिज्म जांच सख्त है, दिक्कत तो नहीं होगी? हम ऐसा लिखते हैं कि सॉफ्टवेयर में न फंसे। एमपी के कई कॉलेजों में जांच नहीं होती, लेकिन कड़ाई है, इसलिए मेहनत ज्यादा लगती है। सिनॉप्सिस जमा होने के बाद पर्याप्त समय मिलता है। थीसिस बिकना अनैतिक, तुरंत लगे रोक : प्रिंसिपल आरएनटी मेडिकल कॉलेज में एथिकल कमेटी थीसिस की जांच करती है। बाजार में ऐसी थीसिस बिक रही है तो गलत है। -डॉ. राहुल जैन, प्रधानाचार्य, आरएनटी मेडिकल कॉलेज, उदयपुर भास्कर एक्सपर्ट : राज्य स्तर पर हो नीतिगत बदलाव ऐसे मामले अधिकतर निजी विवि में सामने आते हैं, लेकिन व्यवस्था सुधार की जरूरत सरकारी विवि में भी है। -डॉ. कैलाश सोड़ानी, पूर्व कुलपति, वर्धमान महावीर खुला विवि