भास्कर न्यूज| बाड़मेर नगर विकास न्यास क्षेत्र में दोहरे मापदंड साफ दिख रहे हैं। यूआईटी अपनी योजनाओं पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। कृषि भूमि से आवासीय में कन्वर्ट हुई अप्रूव्ड कॉलोनियों में सुविधाएं तक नहीं हैं। यूआईटी ने कॉलोनियों को वैध करने के लिए प्रति बीघा करीब 14 लाख रुपए तक कन्वर्जन शुल्क वसूला। 40% जमीन भी सुविधाओं के लिए सरेंडर करवा ली। विकास के नाम पर एक रुपया खर्च नहीं किया। यूआईटी की विभागीय योजनाओं में चौड़ी सड़कें, पार्क, पेयजल, सीवरेज लाइन, सामुदायिक केंद्र प्राथमिकता से बनते हैं। पास की अप्रूव्ड निजी कॉलोनियों में नालियां तक नहीं हैं। बिजली-पानी की लाइनें बिना प्लानिंग फैली हैं। सड़कों पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। 40 फीट चौड़ी सड़कें सिकुड़कर 8 से 10 फीट की रह गई हैं। { मगरा क्षेत्र में 7 बीघा जमीन का कन्वर्जन करवाकर सत्यम सिटी बसाई गई। यहां 47 परिवार रह रहे हैं। मुख्य मार्ग से कॉलोनी तक पहुंचने का रास्ता आज तक नहीं बना। डामर तो दूर, ग्रेवल सड़क तक नहीं है। बड़े गड्ढे हैं। { मगरा में 18 बीघा कृषि भूमि कन्वर्ट कर 93 प्लॉट की बालाजी नगर कॉलोनी काटी गई। यहां 60 परिवार रहते हैं। कॉलोनी के अंदर मालिक ने डामर सड़क बना दी। शहर से जोड़ने वाली मुख्य कनेक्टिंग रोड उखड़ी पड़ी है। { बायपास मार्ग पर 48.09 बीघा में विकसित वीर तेजाजी कॉलोनी में करीब 30 मकान बन चुके हैं। शुल्क चुकाने के बाद भी यूआईटी ने कॉलोनी को मुख्य सीवरेज लाइन से नहीं जोड़ा। पहुंच मार्ग सुधारने में भी विभाग ने रुचि नहीं दिखाई। सड़क पर गहरे गड्ढे बने हैं। भास्कर समाधान : यूआईटी प्रति बीघा 14 लाख रुपए वसूलती है। भूखंडों के आकार के हिसाब से हजारों-लाखों रुपए का नियमन व विकास शुल्क भी लेती है। स्थानीय निवासियों और जानकारों का कहना है कि वसूली गई कुल राशि का सिर्फ 50% भी संबंधित कॉलोनियों के बुनियादी ढांचे पर खर्च हो जाए तो हालात बदल सकते हैं। डामर सड़कें बन सकती हैं। नाली तंत्र बन सकता है। पार्क बन सकते हैं। रोड लाइट लग सकती हैं। विभाग को राजस्व बढ़ाने के साथ जवाबदेही भी तय करनी होगी।