प्रदेश के खान विभाग में पाँच महिलाएँ अब असिस्टेंट माइनिंग इंजीनियर बन गई हैं। इनमें मालती थानवी, प्रज्ञा वैष्णव, सोनू अवस्थी, दिव्यांशी पंवार और मानसी पंवार को जल्द पोस्टिंग दी जाएगी। गौरतलब है कि खान विभाग के 76 वर्ष के इतिहास में पहला मौका है, जब महिलाओं को यह जिम्मेदारी मिली है। 13 साल पहले तक संबंधित कोर्स में इनके प्रवेश पर भी रोक थी। इसकी वजह यह थी कि गहराई में उतरकर टनल के अंदर तक की वर्किंग को महिलाओं के लिए जोखिमभरा माना जाता था। 13 वर्ष पहले सुंदरा सोढा ने हाईकोर्ट से परमिशन लेकर एडमिशन पाया था और उसके बाद इस पद के लिए बेटियों को मौका मिला। बदलाव और भर्ती आने में समय लगा और 13 साल बाद पाँच बेटियों को वह काम मिलने जा रहा है, जिसे सिर्फ पुरुष करते थे। शेष | पेज 6 डॉ. चंद्राणी ने 1999 में राह खोली, जिसे राज्य ने आधार माना : पहली महिला माइनिंग इंजीनियर का संघर्ष डॉ. चंद्राणी प्रसाद वर्मा के नाम रहा, जिन्होंने 90 के दशक में देश की पहली महिला माइनिंग इंजीनियर बनने का गौरव हासिल किया था। उन्हें भी डिप्लोमा के बाद डिग्री कोर्स में एडमिशन के लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। वे नागपुर की थीं और बॉम्बे हाईकोर्ट से केस जीता था। पहली बार बेटियाँ मोर्चा संभालेंगी........ सेना में महिलाएँ मोर्चा संभाल रही हैं, तो माइनिंग में क्यों नहीं? इसी सोच के चलते सरकार ने मौका दिया है। इससे पहले जोखिम भरे कार्यों की वजह से इन्हें रोका जाता था। चूँकि अब खतरा कम हो गया है और सिस्टम अपडेट है। ऐसे में ये जल्द ही मोर्चे पर मिलेंगी। — एमपी मीणा, डायरेक्टर माइंस सुंदरा के संघर्ष ने महिलाओं के लिए टनल की राह खोल दी राजस्थान की छात्रा सुन्दरा सोढ़ा ने राज्य के इंजीनियरिंग कॉलेजों में माइनिंग में एडमिशन के लिए आवेदन किया था। सरकार का तर्क था कि महिलाओं के लिए माइनिंग में सीटें आरक्षित नहीं हैं और वे माइंस एक्ट के तहत खदानों में काम नहीं कर सकतीं। हाई कोर्ट ने 2013 में सरकार और एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर तथा सीटीएई उदयपुर जैसे संस्थानों को माइनिंग इंजीनियरिंग में छात्राओं के एडमिशन को स्वीकार करना पड़ा। कोर्ट ने माना कि शिक्षा के हक को लैंगिक आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता। माइंस एक्ट में टनल में नहीं उतर सकती थीं महिलाएं माइंस एक्ट 1952 के कानून की धारा 46 के तहत महिलाओं को भूमिगत खदानों में काम करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध था। इस कानून का हवाला देकर देश के प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेजों ने माइनिंग इंजीनियरिंग कोर्स में लड़कियों के एडमिशन लेने पर रोक लगा रखी थी। तर्क था कि महिलाएं खदानों में जा ही नहीं सकतीं, तो वे प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कैसे पूरी करेंगी? हाई कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया था।