ब्यूरोक्रेसी में रहते लोकसेवा जिनके कार्य का हिस्सा रही, सेवानिवृति के बाद भी उनका यह आजीवन संकल्प बन गया। सिविल सर्विस डे पर हम कुछ ऐसे लोकसेवकों के जीवन से कुछ प्रेरणा की बात करेंगे, जिन्होंने वानप्रस्थ की परिभाषा को बदल दिया है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के 96 बैच के अधिकारी रहे एसएस बिस्सा, 98 बैच के पुलिस सेवा के आनंदवर्धन शुक्ला और भारतीय वन सेवा के 94 बैच के अधिकारी रहे अजय गुप्ता कुछ ऐसे ही लोकसेवक रहे, जो आज सेवानिवृति के बाद भी निस्वार्थ लोकसेवा को आगे बढ़ा रहे हैं। मौत के बाद भी धड़का रहे जिंदगी पूर्व आईएफएस अजय गुप्ता सेवानिवृति के 7 वर्ष में अंगदान, नेत्रदान से जुड़े, गरीब बच्चों को लोकसेवा की पढ़ाई भी करा रहे। बताते हैं, सर्विस के दौरान दफ्तर की एक कर्मचारी को सुनाई नहीं देता था। कमरे की घंटी सुनाई नहीं देती तो वह समझ भी नहीं पाती कि काम क्या है। छोटे से प्रयास से उसके कानों को मशीन मिली तो जैसे उसके जीवन में नई रोशनी आ गई। जो सुकून उस काम ने दिया, उसी ने आज की प्रेरणा को पुख्ता कर दिया। अब किसी परिवार में मौत पर जब अंगदान को प्रेरित करने पहुंचते हैं तो ऐसा लगता है जैसे मौत के बाद भी जिंदगी धड़क उठी। ... और जिस परिवार के किसी सदस्य को उसके किसी अंग से नया जीवन मिलता है, वे हमारी ओर ईश्वरीय भाव से देखते हैं। यही जीवन का सबसे बड़ा सार है। टूटे अंगों को सहेजना ही जीवन सेवानिवृत आईएएस एसएस बिस्सा सेवाकाल के दौरान कुछ ऐसे विभागों से जुड़े, जहां लोकसेवा का असल महत्व समझ आया। अब भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति के साथ ऑनरेरी रूप में जुड़कर कई सालों से टूटे अंगों को बनाए जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बिस्सा बताते हैं, बिहार से एक पतला-दुबला कपल, दोनों का वजन 50 किलो से भी कम, पत्नी को कंधे पर लेकर पहुंचा। उसके एक हाथ और एक पांव कट चुके थे। जिसने भी देखा आंखें नम हो गईं। लड़के की मां ने कह दिया था, छोड़ दे इसे, पर वह गरीब था, संबंधों का सबसे अमीर, बोला- साब कैसे छोड़ देता, शादी करके लाया हूं। अब ऐसे लोगों की सेवा मन को सुकून देता है कि नहीं। यही लक्ष्य है। ऐसे कई काम अब आगे बढ़ाए हैं जीवन में। खुशहाल, तनाव रहित जीवन की पाठशाला सेवानिवृत आईपीएस आनंद वर्धन शुक्ला सेवा काल के दौरान अपने साथियों के तनाव और पारिवारिक परेशानियों से रूबरू होते रहे। वे बातों ही बातों में उन्हें समझाते... कुछ के जीवन की कार्यशैली को बदलने में कामयाब हुए तो जीवन का लक्ष्य भी कुछ इसके इर्द-गिर्द का बना लिया। शुक्ला बताते हैं, जब वे लोगों के बीच बैठते हैं तो लक्ष्य यही रहता है कि किसी अपनी बात से उसका जीवन बदल जाए। प्रशिक्षक बनकर, मोटीवेशनल स्पीकर बनकर लोगों के बीच बदलाव की कवायद में लगे हैं। शुक्ला अपने कुछ सेवानिवृत साथियों के साथ रोड सेफ्टी पर काम कर रहे हैं। अपने साथियों के साथ मिलकर ट्रैफिक पुलिस को भी अलग-अलग राज्यों की पुलिस के साथ ट्रेन करा रहे हैं।