सरकारी रिकॉर्ड में जो मशीन जोधपुर के बिलाड़ा कार्यालय में ‘सीलपैक’ थी, वह आधी रात फर्जी आधार स्लिप जनरेट कर रही थी। जो मशीन असम के सुदूर इलाकों के लिए अलॉट थी, वह राजस्थान के ओसियां में अवैध कैंप में बच्चों की उम्र बदल रही थी। जिस व्यक्ति को राजस्थान के एक अस्पताल ने ‘मृत’ घोषित कर दिया था, वह उसी वक्त एमपी में कार फाइनेंस करवा रहा था। भास्कर पड़ताल में आया कि यूआईडीएआई में भी गिरोह ने सेंध लगा दी। गिरोह ने जन्मतिथि में फर्जीवाड़ा कर आरटीई में एडमिशन दिला दिया। बुजुर्ग पेंशन को लेकर भी आयु में हेरफेर कर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया। फर्जी दस्तावेज बनाने में कमाई के साथ उपयोग कर गिरोह ने करोड़ों कमाए। लोहावट थाना (केस 93/2026) और मतोड़ा थाना (केस 65/2026) दर्ज हैं। मृत विजय के नाम कार फाइनेंस को लेकर आरटीओ जोधपुर ने एमपी के डीलर और एचडीएफसी बैंक को दस्तावेजों के साथ तलब किया है। बच्चों के जन्मतिथि में हेरफेर, RTE में दाखिले असम की इन बाईपास मशीनों का इस्तेमाल राजकीय डिजिटल रिकॉर्ड में हेरफेर करके जन्मतिथियां बदलने में भी हो रहा था। गैंग बच्चों के असली जन्म प्रमाण पत्रों को गायब कर देती थी। बालक महेश की जन्म तिथि 10 मार्च 2018 (जन आधार आईडी- 5082305486) की उम्र 2 साल कर दी गई। अफसाना नाम के दो फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाए यह गिरोह पहचान पोर्टल पर मौजूद वास्तविक नागरिकों के क्यूआर कोड चुराता था। पोर्टल पर पंजीकरण संख्या 08133008410008700072/2025 में ‘झनकारी’ पुत्री किशना राम के नाम पर पंजीकृत थी। गिरोह ने बारकोड के डेटा को एडिट किया ‘अफसाना खातून’ के नाम से दो जन्म प्रमाण पत्र बनाए। सरकारी सिस्टम को चुनौती और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गैंग की पूरी कहानी कर्मी की आईडी हैक कर व्यक्ति के दो मृत्यु प्रमाणपत्र बना ​दिए असम से राजस्थान तक सीलपैक मशीनों का अवैध नेटवर्क बनाया एमपी में शोरूम, जोधपुर में बैंक से ‘मुर्दे’ के नाम कार फाइनेंस मुख्य सूत्रधार पकड़ से दूर जिम्मेदार बोले-हमारे पास डेटा नहीं, जांच की जा रही हमने इस मामले में निदेशालय और गुजरात इंफोटेक कंपनी को अवगत करा दिया है। वे ही इसकी जांच करेंगे। हमारे पास न तो डेटा है और न ही संसाधन। -रावताराम, उप निदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग, जोधपुर डॉक्टर के फर्जी हस्ताक्षर से मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के मामले में जांच चल रही है। आरोपियों का पता लगा रहे हैं। इसमें पहले लोग नामजद नहीं थे, इसलिए अज्ञात पर केस दर्ज किया गया था।’ -हरीसिंह राजपुरोहित, केस के आईओ