बच्चों में हड्डियों की बीमारी रिकेट्स (सूखा रोग) को आमतौर पर विटामिन डी की कमी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी वजह दुर्लभ आनुवंशिक विकार भी हो सकते हैं। ऐसे मामलों में बार-बार विटामिन डी और कैल्शियम देने के बावजूद पर्याप्त सुधार नहीं होता और बीमारी की सही पहचान में वर्षों लग सकते हैं। एम्स जोधपुर के विशेषज्ञों ने बताया कि ऐसे मरीजों में बीमारी के वास्तविक कारण की पहचान कर समय पर उचित उपचार शुरू करना जरूरी है। एम्स पीडियाट्रिक विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. वरुणा व्यास के अनुसार हाइपोफॉस्फेटेमिक रिकेट्स ऐसा ही दुर्लभ विकार है। इसमें शरीर में फॉस्फेट के चयापचय से जुड़ी गड़बड़ी हड्डियों के विकास और खनिजीकरण को प्रभावित करती है। ऐसे मरीजों को सामान्य पोषण संबंधी रिकेट्स का मरीज मान लिया जाता है। ह​ड्डियों की स्थायी विकृति के मरीजों की जांच हो विशेषज्ञों के अनुसार परिवार में बीमारी का इतिहास, शैशवावस्था में लक्षण शुरू होना, बीमारी का गंभीर रूप, विटामिन डी का स्तर सामान्य होने के बावजूद लक्षण बने रहना और खून में फॉस्फेट या कैल्शियम का स्तर कम होना आनुवंशिक रिकेट्स के संकेत हो सकते हैं। ऐसे मरीजों की विशेषज्ञ केंद्र में जांच जरूरी है। समय पर निदान और बीमारी के अनुरूप उपचार से हड्डियों की स्थायी विकृति और अन्य जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है। हाइपोफॉस्फेटेमिक रिकेट्स के कुछ प्रकार 20 हजार से एक लाख लोगों में से किसी एक को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि कुछ प्रकार इससे भी दुर्लभ हैं। दुर्लभ बीमारियों के प्रति जागरूकता पर जोर हाइपोफॉस्फेटेसिया-डे }एक्सपर्ट बोले- समय पर निदान जरूरी डॉ. व्यास के अनुसार, 23 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय एक्स-लिंक्ड हाइपोफॉस्फेटेमिया (एक्सएलएच) जागरूकता दिवस और 30 अक्टूबर का विश्व हाइपोफॉस्फेटेसिया (एचपीपी) दिवस हड्डियों के चयापचय से जुड़ी दुर्लभ बीमारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य शुरुआती पहचान, सटीक निदान, विशेषज्ञ केंद्रों तक समय पर मरीजों की पहुंच और उचित उपचार सुनिश्चित करने के महत्व को सामने लाना है।