राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में इन दिनों देशभर की अलग-अलग कला शैलियां एक ही छत के नीचे नजर आ रही हैं। छह दिवसीय ‘द इंडियन मास्टर्स-आर्ट कैंप’ में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए आठ प्रमुख कलाकार कैनवास पर अपने मनोभावों, अनुभवों और आस-पास की दुनिया को अपने-अपने अंदाज में रंग और रेखाओं के जरिए आकार दे रहे हैं। किसी कैनवास पर प्रकृति और उसके बदलते रंग दिखाई दे रहे हैं तो कहीं मानवीय भावनाओं और स्मृतियों को आकृतियों के माध्यम से उकेरा जा रहा है। कोई कलाकार रंगों, रेखाओं और बनावट के साथ प्रयोग कर रहा है तो कोई भारतीय परंपरा और आधुनिक सोच को अपनी कलाकृति में एक साथ पिरो रहा है। इस तरह एक ही कला शिविर में अलग-अलग क्षेत्रों और विचारों से आए कलाकारों की रचनात्मक दुनिया देखने को मिल रही है। वहीं राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट की कई साल से बंद पड़ी लीथोग्राफी मशीन पर कैंप में आए कलाकार काम कर रहे है। स्टूडेंट्स के बीच यह आर्ट आकर्षित कर रही है। 20 सितंबर तक चल रहे इस कला शिविर में कलाकारों को सामने बैठकर काम करते देखना कला प्रेमियों के लिए भी एक अलग अनुभव है। अपनी-अपनी शैली में कैनवास को दे रहे नया रूप उदयपुर के कलाकार शैल चोयल अपनी समकालीन मिनिएचर शैली के जरिए पारंपरिक राजस्थानी कला को आधुनिक नजरिए से जोड़ते दिखाई देते हैं। उनकी कला में राजस्थान की चित्र परंपरा की झलक के साथ समकालीन सोच का मेल नजर आता है। वहीं कोलकाता के समीर ऐच रंग, आकार, रोशनी और बनावट के साथ प्रयोग करते हुए भावनाओं को कैनवास पर उतारते हैं। उनकी कला यात्रा यथार्थवादी शैली से आगे बढ़कर अर्ध-अमूर्त और आकृतिमूलक कला तक पहुंची है। यहां देखिए इवेंट के फोटोज… अलग-अलग जगहों से आए कलाकार असम के प्रिंटमेकर अजीत सील का काम इस शिविर में अलग तरह का आकर्षण पैदा कर रहा है। मानव और पशु आकृतियों के माध्यम से भावनाओं और विचारों को सामने लाने वाली उनकी कला में प्रिंटमेकिंग की बारीकियां दिखाई देती हैं। वे लिथोग्राफी और अन्य पारंपरिक प्रिंट तकनीकों के जरिए कला को एक अलग माध्यम देते हैं। इंदौर के अखिलेश वर्मा अमूर्त चित्रों में रंग, रेखा, आकार और बनावट के साथ प्रयोग करते हैं। उनकी कलाकृतियों में किसी एक दृश्य को हूबहू उतारने के बजाय भाव और विचारों को रंगों के जरिए महसूस कराने की कोशिश दिखाई देती है। नागपुर के रघु नवारे की कला प्रकृति और मनुष्य के उसके साथ संबंध से प्रेरित है। उनकी पेंटिंग्स में प्राकृतिक दृश्यों के साथ गहरे रंग, बनावट और प्रभावशाली ब्रशवर्क दिखाई देता है। वहीं गुजरात के जयंत रबाड़िया भारतीय पौराणिक कथाओं, मानव आकृतियों और पशु-पक्षियों को अपनी रचनात्मक दृष्टि से कैनवास पर प्रस्तुत करते हैं। उनकी कला में भावनाओं के साथ भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ भी नजर आते हैं। हिमाचल प्रदेश के डॉ. नंद लाल ठाकुर गांव के जीवन, पुरानी यादों और हिमाचल की प्राकृतिक छवियों को अपनी चित्रकला का हिस्सा बनाते हैं। उनकी पेंटिंग्स में रंग और बनावट के जरिए पहाड़ी जीवन और प्रकृति की अनुभूति सामने आती है। वहीं असम के संजीब कुमार गोगोई की कला में आकृतिमूलक और अमूर्त शैली का मेल दिखाई देता है। उनके काम में असम की संस्कृति और परंपराओं की झलक के साथ अपनी अलग दृश्य शैली नजर आती है। कलाकारों को काम करते देखना बना कला प्रेमियों के लिए अनूठा अनुभव इस कला शिविर की खासियत यह है कि यहां कलाकार केवल अपनी तैयार कलाकृतियां प्रदर्शित नहीं कर रहे, बल्कि उनके सामने कैनवास है और वे उसी पर अपनी रचनात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। ब्रश से लगाई जा रही एक-एक रेखा, रंगों की परतें, आकृतियों का बनना और फिर उनमें बदलाव करना, कलाकारों के काम करने की पूरी प्रक्रिया को करीब से देखने का अवसर मिल रहा है। अलग-अलग कलाकारों का कैनवास भी उनकी सोच की तरह अलग नजर आता है। कोई पहले हल्की रेखाओं से संरचना तैयार करता है और उसके बाद रंगों की परतें चढ़ाता है, तो कोई रंगों और बनावट से ही अपनी रचना का आधार तैयार करता है। कहीं आकृतियां धीरे-धीरे स्पष्ट होती हैं तो कहीं रंग और रेखाएं मिलकर ऐसा दृश्य बनाती हैं, जिसमें दर्शक अपने अर्थ तलाश सकता है। राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट के विद्यार्थियों से हुआ सीधा संवाद कला शिविर में आए कलाकार राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट भी पहुंचे, जहां उन्होंने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। इस दौरान विद्यार्थियों को वरिष्ठ कलाकारों के अनुभवों को करीब से जानने और उनकी कला प्रक्रिया को समझने का अवसर मिला। विशेष रूप से प्रख्यात प्रिंटमेकर अजीत सील ने विद्यार्थियों को लिथोग्राफी और प्रिंटमेकिंग की बारीकियों से परिचित कराया। उन्होंने विद्यार्थियों को इस पारंपरिक कला तकनीक की प्रक्रिया, इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री और तकनीकी प्रयोगों के बारे में जानकारी दी। विद्यार्थियों ने भी इस प्रक्रिया को समझने के साथ स्वयं प्रयोग किए। अजीत सील का जोर इस बात पर रहा कि कला केवल कैनवास पर कुछ बना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि कला की परंपराओं और तकनीकों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है। डिजिटल दौर में लिथोग्राफी जैसी पारंपरिक विधाओं के प्रति युवाओं की रुचि बनाए रखने के लिए ऐसे संवाद और व्यावहारिक प्रशिक्षण महत्वपूर्ण हैं।