रेगिस्तान के सबसे रहस्यमयी शिकारी ‘सियाहगोश’ (कैराकल) को विलुप्त होने से बचाने के लिए देश का पहला ‘नेशनल मास्टरप्लान’ तैयार हो गया है। यह दुर्लभ जीव अब राजस्थान की सरजमीं पर अपना ‘गढ़’ बनाएगा। हाल ही में जैसलमेर के शाहगढ़ बल्ज और रामगढ़ के धोरों में मिले पुख्ता सबूतों के बाद इसके संरक्षण के इस रोडमैप पर मुहर लगा दी गई है। खास बात यह है कि बॉर्डर इलाकों में रेडियो कॉलरिंग के जरिए यह प्रमाणित हो चुका है कि सियाहगोश न केवल वहां मौजूद है, बल्कि उसका कुनबा भी फल-फूल रहा है। इस नेशनल प्लान के तहत पूरे राजस्थान को दो बड़े संरक्षण क्षेत्रों (लैंडस्केप) में बांटा गया है। पहला ‘थार मरुस्थल’ जिसमें जैसलमेर के रेतीले धोरों और कच्छ के रण को जोड़ा जाएगा। दूसरा ‘ग्रेटर रणथंभौर’ जिसमें रणथंभौर से लेकर धौलपुर, करौली और मुकुंदरा तक के जंगल शामिल होंगे। रणनीति यह है कि उन इलाकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जहां बाघ या लेपर्ड का दबाव कम है, ताकि सियाहगोश जैसे छोटे शिकारी बिना किसी डर के पनप सकें। एसएसीओएन के डेटा के आधार पर योजना बनेगी कोयंबटूर स्थित एसएसीओएन देशभर में सियाहगोश के ठिकानों की मैपिंग करेगी। टूरिज्म एंड वाइल्डलाइफ सोसायटी ऑफ इंडिया के सचिव हर्षवर्धन ने कहा कि विशेषज्ञ यह पता लगाएंगे कि यह जानवर केवल घने जंगलों तक सीमित है या फिर खेतों और झाड़ियों के बीच भी सुरक्षित ठिकाने बना रहा है। इसी डेटा के आधार पर इनकी संख्या का आकलन कर दीर्घकालीन योजना लागू होगी। “सियाहगोश के संरक्षण के लिए यह पहला व्यवस्थित नेशनल प्लान है। इसे दो हिस्सों में बांटकर काम शुरू किया गया है। जल्द ही इनकी डाइट और व्यवहार पर वैज्ञानिक डेटा सामने आएगा, जिससे इनके संरक्षण में मदद मिलेगी।” -डॉ. गोबिंद सागर भारद्वाज, निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान