उदयपुर का जगदीश मंदिर अपना 374वां पाटोत्सव मना रहा है। आज से दो दिवसीय कार्यक्रम होंगे। इस मंदिर का इतिहास का भी बड़ा रोचक है। लोक मान्यता है कि महाराणा जगत सिंह प्रथम को जगन्नाथ स्वामी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। उन्होंने उदयपुर में उनकी प्रतिमा स्थापित करने का संकेत दिया था। इसके बाद मेवाड़ के शासक महाराणा जगत सिंह प्रथम ने साल 1651 ईस्वी में मंदिर का निर्माण करवाया था। वैशाख पूर्णिमा पर इस मंदिर में भगवान की मूर्ति स्थापित की गई थी। 50 से ज्यादा स्तंभों पर खड़े इस मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर बारीक नक्काशी की गई है, जिसमें हाथी, घोड़े, नृत्य और विभिन्न पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। मंदिर की वास्तुकला में इंडो-आर्यन और मारू-गुर्जर शैली का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इस मंदिर के बारे का इतिहास के रोचक किस्से को पढ़िए- 1- मूर्ति प्रतिष्ठा के समय हुआ था चमत्कार जगदीश मंदिर के अंदर की सीढ़ियों पर पुजारी परिषद की ओर से इतिहास की जानकारी दी गई है। एक बार नियम भंग होने पर जगन्नाथ पुरी मंदिर के कपाट बंद हो गए थे, जिससे व्यथित होकर महाराणा ने अन्न-जल त्याग दिया था। तब भगवान ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया कि वे मेवाड़ में ही मंदिर बनवाएं। इसके बाद डूंगरपुर के शरण पर्वत से भगवान की प्रतिमा लाई गई थी। प्रतिष्ठा के समय चमत्कार हुआ था। भगवान को पहले चढ़ाए गए चार सोने के कड़े नई मूर्ति में स्वतः धारण हो गए। इसे भगवान के मेवाड़ आगमन का संकेत माना गया और महाराणा की श्रद्धा और भी दृढ़ हो गई। 2- जगन्नाथपुरी मंदिर में पहनाए कड़े प्रतिमा को करवाए थे धारण पुजारी परिषद के अनुसार- जब मूर्ति प्रतिष्ठा का समय नजदीक आया तो महाराणा जगत सिंह के मन में शंका उत्पन्न हुई कि प्रभु का पदार्पण इस प्रतिमा में होगा या नहीं। इसी विचार में सोये महाराणा को भगवान ने स्वप्न दिया कि जगन्नाथपुरी मंदिर में तुमने मुझे जो चार सोने के कड़े पहनाये थे, वो ही कड़े मूर्ति प्रतिष्ठा के समय इस नव प्रतिमा के हाथों में अपने आप धारण हो जाएंगे तो समझ लेना कि मैं मेवाड़ में आ गया हूं। वास्तव में ऐसा ही हुआ। तब महाराणा को विश्वास हो गया कि भगवान का मेवाड़ में पदार्पण हो गया है। इसके बाद महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने करीब 9 लाख रुपए की लागत से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और इसकी भव्यता को पुनः स्थापित किया। मंदिर की वास्तुकला में इंडो-आर्यन और मारू-गुर्जर शैली इस भव्य मंदिर का निर्माण मेवाड़ के शासक महाराणा जगत सिंह प्रथम ने साल 1651 ईस्वी में करवाया था। मंदिर की वास्तुकला में इंडो-आर्यन और मारू-गुर्जर शैली का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। 50 से ज्यादा स्तंभों पर खड़े इस मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर बारीक नक्काशी की गई है, जिसमें हाथी, घोड़े, नृत्य और विभिन्न पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। उदयपुर के राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. चंद्रशेखर शर्मा के अनुसार- मंदिर ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है और सड़क स्तर से इसकी ऊंचाई लगभग 79 फीट है। पुजारी परिषद तलहटी से इसे 125 फीट ऊंचा बताते है। मंदिर तक पहुंचने के लिए 32 सीढ़ियां बनाई गई हैं। गर्भगृह में काले पत्थर से बनी भगवान विष्णु (जगदीश) की चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है, जो अत्यंत आकर्षक और मनमोहक है। तीन मंजिल ऊंचा मंदिर है। यहां पर छोटे-छोटे मंदिर भी बने हुए डॉ. चंद्रशेखर शर्मा बताते है कि मंदिर परिसर में सूर्य, देवी, शिव और गणेश के छोटे-छोटे मंदिर भी बने हुए हैं, जो इसकी पंचायतन शैली को दर्शाते हैं। मंदिर में स्थापित विशाल प्रशस्ति शिलालेख मेवाड़ के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। मंदिर के वास्तुकारों-भाणा और मुकुंद थे और उनको उत्कृष्ट निर्माण के लिए महाराणा की ओर से जागीर देकर सम्मानित किया गया था।
नरू बारहठ अपने 21 साथियों सहित हुए थे बलिदान कालांतर में देखें तो इस मंदिर ने संघर्ष भी देखा है। मुगल शासक औरंगजेब के काल में मंदिर पर आक्रमण हुआ था, जिसमें इसकी रक्षा करते हुए नरू बारहठ ने अपने साथियों के साथ बलिदान दिया था। महाराणा राजसिंह के समय औरंगजेब ने यहां पर आक्रमण किया था। तब जगदीश मंदिर की रक्षा के लिए नरू बारहठ अपने 21 साथियों सहित यहां पर बलिदान हो गए थे। इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में तीन महीने पहले ही महत्वपूर्ण जानकारी युक्त शिलालेख यहां स्थापित किया गया था। वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को यहां विशेष पाटोत्सव होता पुजारी परिषद के अनुसार- वि.स. 1708 दितीय वैशाखी पूर्णिमा को इसका प्रतिष्ठा समारोह हुआ था। धार्मिक परंपराओं के तहत प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को यहां विशेष पाटोत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान का विशेष श्रृंगार, अभिषेक, 56 भोग और ध्वजारोहण किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।